अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक हैं “मंगल पांडे”

टूटीकॉर्न, तमिल नाडू मे पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों की हत्या ‘एकाधिकारी-
दलाल-यारा-कोरपोरेट पूंजीवाद (monopoly-comprador-crony-corporate capitalism)’ के बड़े स्तम्भ–वेदांता कंपनी–द्वारा भारतीय राज्य की ताकत का जनता के खिलाफ इस्तेमाल करने का प्रथम उद्धारण है।

भारतीय पुलिस/अर्धसैनिक बलों को मोदी द्वारा इज़राइल प्रशिक्षण के लिये भेजने का वास्तविक कारण अब स्पष्ट हो गया है।

चेन्नई पुलिस के स्नाइपर्स जिन्होने टूटीकॉर्न मे निहत्थे प्रदर्शनकारियो के खिलाफ मिलिट्री स्तर की रणनीति का प्रयोग किया, उनको प्रशिक्षण इज़राइल की राजधानी तेल अवीव मे मिला था।

किसे लानत भेजें इस पर?

भारतीय राज्य की उपेक्षा कर इज़राइल, जिसने हाल ही मे 52 निहत्थे फिलिस्तीनियों को गोली से भून डाला,
सीधे विभिन्न प्रान्तो की पुलिस बल को प्रशिक्षण दे रहा है! पुलिस हमारे दिये हुए टैक्स पर पल रही है। और इज़राइल की शह पा रहे कॉरपोरेटस के ईशारे पर हमी पर गोली चला रही है!

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी

भारत ने पहले भी प्राइवेट कार्पोरेट्स के शासन को झेला है। भारत का ब्रिटिश औपनिवेशीकरण एक प्राइवेट कम्पनी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी (BEIC ) के एकधिकार से शुरू हुआ।

BEIC ने बंगाल, बाम्बे और मद्रास प्रेसीडेंसी मे भारतीय सिपाहियों की निजी सेनाएं तैयार कीं। इन सेनाओं ने BEIC के लिये भारतीय उपमहाद्वीप और एशिया के एक बडे भूभाग को जीता।

फिर BEIC ने इन सेनाओ का उपयोग आंतरिक मामलो मे शुरू किया। बंगाल नेटिव आर्मी मे कोई भी बंगाली नही था। बल्कि हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार से निकले किसान पृष्ठभूमि के सैनिक थे। बंगाल नेटिव आर्मी का उपयोग 1856 मे अवध के विलय के लिये किया गया। 19वी और 34वी बंगाल नेटिव आर्मी रेजिमेंट्स उस समय लखनऊ मे थी जब वाजिद अली शाह के राज्य को अवैध तरीके से उनसे जबरन छीन लिया गया!

भारतीय राज्यो को हड़पने के अतिरिक्त, BEIC ने भारतीय सैनिको को भारतीय जनता की शोषण के खिलाफ बगावत को कुचलने के लिये भी इस्तेमाल किया।

संथाल विद्रोह

1820 तक BEIC की पहुंच दूर दराज के क्षेत्रो, जंगल और पहाड़ी इलाक़े, जहाँ आदिवासी रहते थे, तक हो गई थी। ये क्षेत्र संसाधनो से काफी समृद्ध थे। यहाँ BEIC ने ना सिर्फ खनिजो के दोहन और व्यापार पर कब्जा किया, बल्कि जंगली भूमि को हड़पना और भाड़े पर बाहरी लोगों को देना भी शुरू कर दिया था।

BEIC उस समय हर चीज (व्यापार, उत्पादन, वस्तु के निर्यात और आयात) पर एकाधिकार कायम कर चुकी थी। चीनी, कपड़े, सिल्क, मसाले, कपास, नमक, नील, अफीम सबके व्यापार पर उसका कब्ज़ा था। कांट्रैक फार्मिंग के तहत किसानो की जमीन छीनकर बनिया और मुनाफाखोरो को दे दी गई थी। इस कारण बड़े पैमाने पर विस्थापन, महामारी, किसानो/दस्तकारो का पलायन शुरू हो गया था।

BEIC के इस शोषण के विरोध मे बंगाल बिहार के संथाल आदिवासियो ने 1855 मे एक खुली बगावत कर दी। सिद्धू और कान्हू के नेतृत्व मे संथाल विद्रोह ने जंगल महल-छोटा नागपुर मे ब्रिटिश शासन की जड़े हिला दी। संथालो ने BEIC के पुलिस फोर्स से कई लडाइयाँ लडी। अपने प्राचीन घातक हथियारो से संथाल कई लडाइयां जीते।
BEIC ने अंततः अपनी नियमित सेना की 7वी और 40वी बीएनआई रेजीमेंट को विद्रोह को कुचलने के लिये भेजा। संथालो को हरा दिया गया पर 7वी और 40वी बीएनआई के भारतीय सैनिको को काफी धक्का लगा। उन्हे अपने ही लोगो को मारना पड़ा जो उन्होने पसंद नही किया।

1857: कार्पोरेट औपनिवेशीकरण के विरुद्ध विद्रोह

संथाल विद्रोह 1856 मे खत्म हो गया। 10 मई 1857 को एक प्राइवेट कम्पनी BEIC द्वारा भारत पर शासन के खिलाफ विद्रोह शुरू हो गया।

25 जुलाई 1857 को 7वी और 40वी बीएनआई बटालियन ने पटना के निकट दानापुर छावनी मे BEIC की गुलामी के जुएं को उतार फेंका। उन्होने अपने ज्यादातर गोरे अधिकारियो को मार दिया और 1857 मे बिहार मे चल रहे आंदोलन के नेता राज कुंवर सिंह के साथ हो लिये।

7वी और 40वी बीएनआई सिपाही ब्रिटिश रूल के खिलाफ आदिवासियो को जागृत करने के लिये छोटा नागपुर और सिन्हभूमि मे भी दूर दूर तक गये। कई 7वी और 40वी बीएनआई सिपाही जिन्होने पहले संथालो को दबाया था अपने आदिवासी कामरेड साथियो के साथ 1857, 1858, 1859 मे लडते हुये शहीद हो गये।

मंगल पांडे की वर्तमान प्रासंगिकता

जैसा कि ऊपर वर्णित है, 34वी और 19वी बीएनआई को लखनऊ मे नियुक्त थीं जब BEIC ने अवध को हड़पा।

मंगल पांडे 34वी बीएनआई के एक सिपाही थी। वो फैज़ाबाद, अवध के निवासी थे। बंगाल आर्मी मे कई अन्य अवध क्षेत्र के सिपाहियो की तरह वो भी अवध को हड़पने के विरुद्ध थे।

34वी और 19वी बटालियन के अन्य सैनिको के साथ मंगल पांडे वाजिद अली शाह से मिलने गये। सैनिक तभी बगावत करना चाहते थे, परंतु वाजिद अली शाह ने उन्हे 1 साल इंतजार करने के लिये कहा।

29 मार्च 1857 को मंगल पांडे ने अपने गोरे अधिकारी पर गोली चला दी जिससे कार्पोरेट शासन के विरुद्ध सबसे बडी बगावत का जन्म हुआ!!!

1857 ने भारत मे ही नही बल्कि पूरे विश्व मे कार्पोरेट रूल का अंत कर दिया. सिर्फ सोवियत यूनियन के पतन के बाद ही कार्पोरेट फिर से राजनीतिक रूप से सक्रिय हुये।

यही वो असली कारण है जिससे पश्चिमी देश 1857 या मंगल पांडे के जिक्र से घबराते हैं। वैश्विक पूंजीवाद और इनके भारतीय पिछलग्गुओ के लिये मंगल पांडे प्रतिरोध के प्रतीक हैं।

यही कारण है कि 1857 राष्ट्रवादी मंच के द्वारा यूपी विधानसभा के सामने मंगल पांडे की प्रतिमा की स्थापना के प्रयास का आज भारत पर शासन कर रहे फासिस्ट और कोरपरेट ताकते विरोध कर रही हैं!!!

टूटीकॉर्न मे अपने ही देश वासियों पर गोली चलवाने वालों को यह याद रखना चाहिये की 1857 मे मंगल पांडे जैसे लाखों सिपाहियों ने उनका क्या हश्र किया था!!!

अमरेश मिश्र
संयोजक
1857 राष्ट्रवादी मंच

 

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