भारतीय ब्यूरोक्रेसी की सबसे अहम नियुक्तिया अब निजी क्षेत्र से की जाएंगी

लीजिए मोदी राज का नया चमत्कार देखिए, मोदी सरकार ने फैसला किया है कि भारतीय ब्यूरोक्रेसी की सबसे अहम नियुक्तिया अब निजी क्षेत्र से की जाएंगी. डिप्टी सेक्रेटरी, डायरेक्टर लेवल के 60 फीसदी पोस्ट अब प्राइवेट सेक्टर से भरी जाएगी . वरिष्ठ आईएसएस अधिकारी अब इनके मातहत काम करेंगे.

इंडियन एक्सप्रेस की खबर बताती है कि 3 जून को डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग के सचिव ने अपने विभाग की एक बैठक ली है इस बैठक में सचिव ने एक प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए हैं, जिसके तहत प्राइवेट सेक्टर के करीब 400 विशेषज्ञों को सेंट्रल स्टाफिंग स्कीम के तहत डिप्टी सेक्रेटरी और डायरेक्टर की पोस्ट पर भर्ती करने को कहा गया है.

दरअसल सरकार में सेंट्रल स्टाफिंग स्कीम के तहत डिप्टी सेक्रेटरी और डायरेक्टर स्तर के कुल 650 पद हैं। अब ऐसे में 400 पदों पर प्राइवेट सेक्टर के विशेषज्ञों की भर्ती का मतलब है कि प्रशासन के इन अहम पदों के 60 प्रतिशत पर निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों का कब्जा हो जाएगा और  प्रमोशन पाए हुए आईएएस को मिलेगा ठेंगा.

एक ही झटके में आरक्षण और पदोन्नति में आरक्षण जैसे सारे विवाद समाप्त हो जाएंगे और बड़े उद्योगपतियों के यहाँ उच्च पदों पर काम करने वाले लोग सीधे सरकारी सेवा में डिप्टी सेक्रेटरी और डायरेक्टर की पोस्ट हासिल कर लेंगे और पूंजीपतियों के ही फेवर की सारी नीतियां बनाएंगे. सबका साथ ओर सबका विकास का सपना तभी तो पूरा होगा….. बाकी as usal मुल्लो को तो टाइट रखा ही जाएगा……….. जय हो मोदी जी की

फ़िल्म समीक्षा – हैदर के बचपन की कहानी है ” हामिद “

बचपन उम्र से तय होता है। बचपना कई सवालों की खोज होता है। मनोविज्ञान हमेशा ‘तलाश’ शब्द के इर्द गिर्द घूमती है। जो चीजें समझ नहीं आती बचपन उसके पीछे बेतरतीब हो कर भागता है। एक जवाब ढूंढते ही दूसरे सवाल के जवाब की तलाश में बचपना खोया रहता है।

हामिद एक ऐसे कश्मीरी बच्चे की कहानी है। यहाँ शायद ‘एक’ कहना गलत होगा दरअसल ‘हामिद’ बहुत सारे कश्मीरी बच्चों की कहानी है। हामिद उनका प्रतिनिधि है। सिनेमा कश्मीरियों की जीवटता को दिखाते हुए  शुरू होता है  यानी “आई स्ट्रगल, आई फाइट, आई विन।“

हामिद सात साल के बच्चे की कहानी है, जिस पर से पिता का साया छुट्टपन में उठ जाता है। पिता को ढूंढने की कोशिश से फ़िल्म शुरू होती है जो कश्मीर और कश्मीर की जिंदगी को रेखांकित करते हुए आगे बढ़ती है।

सात साल का बच्चा गायब हो गए पिता या गायब कर दिए गए पिता की तलाश किस तरह से कर सकता है? हमारे आपके जीवन में बाप बच्चे की तलाश करता है, बाहर जाने पर वापस आने की चिंता हमारे पिता को सताती है। लेकिन हामिद का जीवन उल्टी धारा में बहता है। यानी कि सात साल के बच्चे पर अपने बाप को ढूंढने की जिम्मेदारी है। हामिद किसी सोशल कॉन्ट्रैक्ट के तहत अपने पिता की तलाश नहीं करता,बल्कि पिता के प्यार को पाने की चाहत लिए आँखें पिता की तलाश में खोई रहती है।

हामिद को अपने पिता की तलाश में अल्लाह सबसे बड़ा मददगार दिखाई देता है क्योंकि उसे बताया जाता है अल्लाह कुछ भी कर सकता है, अल्लाह किसी को वापस भेज सकता है या किसी को मौत के घाट उतार सकता है। अल्लाह की तलाश उसे इंडियन आर्मी के जवान तक पहुंचा देती है। यहाँ निर्देशक ने बड़ी ही चालाकी से दिखाने की कोशिश की है  कश्मीर मे इंडियन आर्मी ही खुदा का पर्याय है।

फ़िल्म छोटे छोटे दृश्यों के माध्यम से कश्मीर के हालातों  को बयां करती है और उसमे सफल भी नजर आती है। हामिद फ़ोन के जरिये इंडियन आर्मी के एक जवान को अल्लाह मान कर बात करता है।जब हामिद को पता चलता है, वह जिसे अल्लाह मान बैठा है, वो दरअसल इंडियन आर्मी का एक जवान है।  इंडियन आर्मी के जवान की आवाज हामिद के फ़ोन में गूंजती है- “मैं अल्लाह नहीं तुम्हारा दुश्मन हूँ और तुम मेरे”। निर्देशक इस  दृश्य के माध्यम से भारतीय राज्य  और कश्मीर के रिश्ते को स्पष्टता प्रदान करने की कोशिश की है।

मैं कभी कश्मीर नहीं गया , कश्मीर को किताबों के जरिये ही देखा है।यूँ भी  दिल्ली में बैठ कर कोई राय कायम करना उचित नहीं है। हमारे जहन में कश्मीर में नेहरू हैं, शेख अब्दुल्ला हैं, जिन्नाह हैं और फूल, पौधे, वादी, घाटी का सुन्दरतम दृश्य है। लेकिन हामिद की कश्मीर ये तीनों नहीं हैं, प्राकृतिक सुंदरता तो है लेकिन उसे कुचलने वाली बख्तर बन्द गाड़ियां भी हैं।इन गाड़ियों से न सिर्फ वादी की प्राकृतिक सुंदरता रौंदी है बल्कि, हामिद जैसे कितने ही बच्चों की जिंदगी को जहन्नुम बनाया है।

हामिद के लिए कश्मीर सुखद एहसास नहीं है। कश्मीर का प्रत्येक घर जेल है, जहां किसी न किसी के इंतजार में घर के बाकी सदस्य जिंदगी गुजार रहे हैं। हामिद के कश्मीर मे दीवारें हैं, छत है, चाहे दीवारें इट की हो या लड़की की, छत टिन की हो या कंक्रीट की, सब एक समान है, सभी घरों से कैदखाने की बू आती है। उस कैदखाने मे इंतजार है किसी के लौट आने का। लगता है फ़ैज़ कश्मीर के कश्मीर के सभी घरों में चुकुमालि बैठे  हैं और गुनगुना रहे हैं चमन पे ग़ारते-गुलचीं से जाने क्या गुज़री, क़फ़स से आज सबा बेक़रार गुज़री है।

हामिद की कहानी आई से वी की तरफ बढ़ती है। वह वी वांट फ्रीडम की जैसे नारों से आज़ादी की आकांक्षा को दिखाती है। हालांकि यह सवाल जहन में आता है कि  परिस्थितियों के हिसाब से क्या यह मांग जायज है? जी हाँ हामिद ऐसे कई सवालों के साथ  आपको छोड़ कर जाता है।

हामिद देखते हुए कई बार हैदर मूवी याद आती है। कई बार लगता है हामिद छोटे हैदर की कहानी है। सिनेमा देखते समय मन में सवाल कौंधता है, क्या हामिद से हैदर बनने यही प्रक्रिया है?, मेरा जवाब हाँ है। आपका जवाब क्या है? यह तय करने के लिए फ़िल्म देखना जरूरी है।जरूरी है कि सिनेमाघरों मे या फिर मोबाइल स्क्रीन पर ही सही मगर हामिद देखी जाए।हामिद उन बच्चों की कहानी है, जिनके जवान होते ही हाथों में पत्थर होता है। उनके हाथों में पत्थर क्यों  है? इस सवाल का जवाब फ़िल्म देखने पर ही मिलेगा।

नज़रिया – राम के नाम पर इतनी ओछी राजनीति नहीं कीजिए

अगर राम आपके आदर्श हैं तो उनके नाम का इस्तेमाल आप किसी को चिढ़ाने, उकसाने के लिए कैसे कर लेते हैं? अगर आप उनमें श्रद्धा रखते हैं तो उनका नाम इतने हल्के में इस्तेमाल कैसे कर पा रहे हैं?

‘जय श्री राम’ के नारे से किसी को आपत्ति नहीं बशर्ते आप अपनी श्रद्धा से यह नारा लगा रहे हों. लेकिन अगर यही नारा आप मसखरी में चीख़ रहे हैं तो ख़ुद से सवाल कीजिए क्या ऐसा करके आप ख़ुद ही राम का नाम बदनाम नहीं कर रहे?

सोचिए अगर प्रधानमंत्री कहीं से गुज़र रहे हों और कुछ लम्पट लड़के भीड़ में छिपकर ‘अल्लाह हो अकबर’ चीख़ने लगें तो यह नज़ारा कैसा होगा? कैसा होगा अगर प्रधानमंत्री की मेल आईडी पर प्रतिदिन सैकड़ों मेल आने लगें जिनमें सिर्फ़ ‘अल्लाह हो अकबर’ लिखा हो?

क्या इस स्थिति को भी आप उतना ही सामान्य मानेंगे जितना ममता बनर्जी की रैली में ‘जय श्री राम’ चीखे जाने और उन्हें ऐसे मेल भेजे जाने को मान रहे हैं?? नहीं, तब आपको लगेगा कि इस्लामिक चरमपंथ बढ़ रहा है, सांप्रदायिक कट्टरता दृढ़ हो रही है और हिंदू ख़तरे में है.

जबकि अभी आप ठीक यही कर रहे हैं. जिस तेवर से आप जय श्री राम का नारा उछाल रहे हैं वह सांप्रदायिक नफ़रत को बढ़ावा देने वाले तेवर हैं, धार्मिक कट्टरता को मज़बूत करने वाले तेवर हैं.

राम के नाम का राजनीतिक इस्तेमाल पहले ही देश में कई बार हो चुका है. कई चुनाव पूरी तरह से ‘राम लहर’ में लड़े और जीते जा चुके हैं. कई दंगों और हिंसक घटनाओं को राम के नाम पर अंजाम दिया जा चुका है. राम के नाम पर हत्याओं के कई दाग़ हम पहले ही लगा चुके हैं, अब इस नाम की और फ़ज़ीहत तो मत कीजिए.

अगर राम सच में आपके आदर्श हैं तो उनके नाम की ऐसी बेक़द्री, ऐसा फूहड़ इस्तेमाल होने से रोकिए. राम को तो मर्यादा पुरषोत्तम कहा गया है. आप हैं कि उनके ही नाम पर सारी मर्यादाएँ तोड़ देने पर आमादा हैं.

गैंगेस्टर के नाम पर दलित, पिछड़े, मुसलमानों को मारी गई गोलियां – रिहाई मंच

लखनऊ/मुज़फ्फ़रनगर, 27 मई 2019: खतौली मुज़फ्फरनगर के शहजाद को सहारनपुर में पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने पर परिजनों द्वारा सवाल उठाने के बाद रिहाई मंच के प्रतिनिधिमंडल ने मुलाक़ात की। प्रतिनिधिमंडल में रविश आलम, आशू चौधरी, इंजीनियर उस्मान, आश मुहम्मद, अमीर अहमद, आरिश त्यागी और साजिद शामिल रहे। मंच ने योगी द्वारा भाजपा की जीत के बाद नए भारत से बनेगा नया उत्तर प्रदेश कहते हुए मुठभेड़ के नाम पर हत्याओं को जायज ठहराने पर कड़ी आपत्ति दर्ज की। रिहाई मंच ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा दोनों राज्य सरकारों को छह महीने में यूपी की तर्ज पर अपराधियों के खिलाफ कड़ा कानून बनाकर उनका सफाया करने के निर्देश को हत्या करने का कानून बनाए जाने का लोकतंत्र विरोधी आदेश करार दिया। निर्देश में यूपी की तर्ज पर गैंगेस्टर एवं असामाजिक गतिविधियां (निरोधक) अधिनियम 1986 पारित करने को कहा गया। मीडिया में आयी खबरें बताती हैं कि कोर्ट की भाषा योगी के ठोंक देने, ऊपर पहुंचा देने जैसी आपत्तिजनक है।

रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि यह अदालती निर्देश ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश में उसी कानून का सहारा लेकर पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों की एनकाउंटर में हत्याएं की जा रही हैं, नौजवानों को विकलांग बनाया जा रहा है। ऐसे कई मामलों की जांच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग कर रहा है और सुप्रीम कोर्ट में भी पीयूसीएल की याचिका विचाराधीन है। इससे आंख मूंद कर दिया गया पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का यह फैसला आपराधिक पुलिस मानसिकता को बढ़ावा देने वाला है। कानून व्यवस्था दुरूस्त करने के नाम पर अगर किसी क़ानून से संविधान और मौलिक अधिकारों की धज्जियां उड़े तो यह न्याय के हित में कतई नहीं है। ऐसा क़ानून मौलिक अधिकारों के खिलाफ राज्य का घातक हथियार होगा, राज्य प्रायोजित हत्याओं को वैधानिकता प्रदान करेगा और राज्य के हित में लोकतंत्र को बंधक बनाएगा।

उन्होंने कहा कि अपराधियों के सफाए के नाम पर उत्तर प्रदेश में हुए एनकाउंटर लोगों को जीने के अधिकार से वंचित करने और मानवाधिकार का गंभीर उल्लंघन किये जाने के मामले हैं। यह विडंबना की इंतिहा है कि अदालत ने फैसला सुनाते समय इस तथ्य को ध्यान में नहीं रखा। अदालती फैसले ने फ़र्जी इनकाउंटर के आरोपों से घिरी योगी सरकार को जैसे राहत देने का काम किया है।

हाईकोर्ट के फैसले से उत्साहित होकर उत्तर प्रदेश पुलिस ने बिना किसी देरी के आंकड़े सार्वजनिक कर दिए। सरकारी आंकड़ों के अनुसार योगी सरकार के ढाई सालों में कुल 3599 एनकाउंटर हुए। इनमें 73 मौतें हुईं और 1059 कथित अपराधी घायल हुए। तमाम मामलों में घुटने के नीचे बोरा बांध कर गोलियां मारी गईं। कुल 8251 अपराधियों को गिरफ्तार करने का दावा किया गया। इसके बावजूद प्रदेश में अपराधों में वृद्धि लगातार जारी है। मतलब यह कि अपराध मुक्ति का सरकारी अभियान अपराधियों के खिलाफ कहने भर को है। इरादा तो दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ राजनीतिक प्रतिशोध लेना है। उत्तर प्रदेश का उदाहरण देकर कानून बनाने और अपराधियों का सफाया करने की बात कहना सत्ताधारी दल से जुड़े अपराधियों को संरक्षण और संगठित अपराध को बढ़ावा देना है। यह राजनीतिक विरोधियों के दमन को कानूनी लबादे में जायज ठहराने जैसा है।

हर एक नागरिक को जीने का अधिकार है, यह मौलिक अधिकार है। एनकाउंटर मतलब हत्या करना नहीं होता। हत्या करना संगीन जुर्म है और उसके लिए कानूनन सख्त सजा का प्रावधान है। हत्या करने का कोई कानून नहीं हो सकता इसलिए इसे किसी भी स्थिति में न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। सजा देने का अधिकार किसी सरकार को नहीं दिया जा सकता।

राजीव यादव
रिहाई मंच

मांग रहे थे घरों में पीने का पानी, भाजपा विधायक ने कर दी पिटाई

क्या आपने गुजरात का वह वायरल वीडियो देखा है, जिसमें गुजरात के नरोदा से भाजपा विधायक बलराम थवानी और उनके समर्थक एक महिला की पिटाई कर रहे हैं. सोशल मीडिया में यह वीडियो जमकर वायरल हो रहा है. वीडियो में देखा जा सकता है, कि एक महिला को किस तरह से पीटा जा रहा है, और लोग कुछ कर नहीं रहे हैं.

दरअसल मामला ये है, कि महिला कुछ लोगों के साथ विधायक Balram Thawani के दफ़्तर पहुंची थी, महिला अपने साथ आये लोगों के साथ पानी की कमी को लेकर कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन का हिस्सा थी. ये सभी लोग विधायक से मिलने आये थे, गर्मी के बढ़ने के बाद से ही देशभर में कई हिस्सों में पानी की भारी की कमी आई हुई है. नरोदा विधानसभा के ये नागरिक अपने विधायक के पास पानी की समस्या को लेकर ही आये थे.

जब विधायक के कार्यालय के बाहर ये लोग पानी की समस्या को लेकर अपनी मांगों के साथ नारेबाज़ी करने लगे तो विधायक के साथी और खुद विधायक इन लोगों को मारने लगे.

ये अलग बात है, कि भाजपा विधायक ने उक्त महिला से माफ़ी मांगने की बात कही है. पर सवाल ये उठता है, कि क्या किसी जनप्रतिनिधि को यह मारपीट शोभा देती है. फ़िलहाल इस घटना में पुलिस ने केस दर्ज की है या नहीं, इसकी हमें जानकारी नहीं है.

भाजपा विधायक के इस वायरल वीडियो के साथ ही ये सवाल उठने लगे हैं, कि क्या अब जनता अपने द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों को अपनी समस्याओं से भी अवगत नहीं करा सकती. आखिर नरोदा ( Naroda ) से भाजपा विधायक बलराम थवानी उस महिला को क्यों मार रहे हैं. जबकि महिला तो सिर्फ पानी की समस्या लेकर आई थी. क्या ये एक महिला का अपमान का मामला नहीं है.

देखें वीडियो

मुख्य निर्वाचन आयुक्त महोदय, यह चुनाव आयोग की साख का सवाल है

ओपी रावत देश के पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त रह चुके हैं। उन्होंने अपने एक बयान में कहा है कि,
” प्रथम दृष्ट्या यह एक गंभीर मामला लगता है। मुझे यह याद नही कि पहले कभी ऐसा प्रकरण ( कि मतगणना में पड़े हुए मतपत्रों और डाले गए वोटों में कोई अंतर ) मेरे कार्यकाल में आयोग के संज्ञान में आया हो। ”

निर्वाचन आयोग पर जो आरोप और आक्षेप लग रहे हैं या लगाए जा रहे हैं, उनका उत्तर केवल और केवल आयोग को ही देना है। अक्सर, ईवीएम में पड़े वोटों और गिने गये वोटों में अंतर की खबरें आ रही हैं। क्विंट वेबसाइट ने इस पर एक लंबी रिपोर्ट भी छापी है । और कोई काम धाम नहीं है क्या  ? “द क्विंट ने चुनाव आयोग के दो सेट आंकड़ों का अध्ययन किया. पहला सेट था वोटर टर्न आउट या ईवीएम में दर्ज की गई वोटिंग और दूसरा सेट था चुनाव 2019 के बाद ईवीएम में की गई वोटों की गिनती. पहले से चौथे चरण के चुनाव में हमने 373 सीटें ऐसी पाईं, जहां आंकड़ों के दोनों सेट में फर्क नजर आया.”

चौथे चरण के चुनाव में  क्विंट ने 373 सीटें ऐसी पाईं, जहां आंकड़ों के दोनों सेट में फर्क नजर आया.

EC के आंकड़े कहते हैं कि
  • तमिलनाडु की कांचीपुरम सीट पर 12,14,086 वोट पड़े. लेकिन जब सभी EVMs की गिनती हुई तो 12,32,417 वोट निकले. यानी जितने वोट पड़े, गिनती में उससे 18,331 वोट ज्यादा निकले. कैसे? निर्वाचन आयोग के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं.
  • तमिलनाडु की ही दूसरी सीट धर्मपुरी पर 11,94,440 वोटरों ने मतदान किया. लेकिन जब गिनती हुई, तो वोटों की संख्या में 17,871 का इजाफा हुआ और कुल गिनती 12,12,311 वोटों की हुई. EVMs ने ये जादू कैसे किया, EC को नहीं मालूम.
  • तमिलनाडु की तीसरी संसदीय सीट श्रीपेरुम्बुदुर के EVMs में 13,88,666 वोट पड़े. लेकिन जब गिनती हुई तो वोटों की संख्या 14,512 बढ़ गई और 14,03,178 पर पहुंच गई. इस चमत्कार का भी EC के पास कोई जवाब नहीं.
  • उत्तर प्रदेश की मथुरा सीट के EVMs में कुल 10,88,206 वोट पड़े, लेकिन 10,98,112 वोटों की गिनती हुई. यानी यहां भी वोटों में 9,906 की बढ़ोत्तरी. कैसे? EC अब भी चुप है।
    ये वो चार संसदीय क्षेत्र हैं, जहां आंकड़ों में सबसे ज्यादा फर्क पाए गए.
  • पहले चार चरण में 373 सीटों के लिए वोट पड़े. वोटों की गिनती के बाद इनमें 220 से ज्यादा सीटों पर मतदान से ज्यादा वोट काउंट दर्ज किये गए. बाकी सीटों पर वोटों की संख्या में कमी पाई गई। द क्विंट ने जब आयोग से पूछा तो चुनाव आयोग ने वोटिंग के सारे आंकड़े हटा लिए।
  • उल्लेखनीय बात यह है कि द क्विंट ने सिर्फ पहले चार चरणों में वोटिंग में असमानता के बारे में पूछा था। इनके बारे में निर्वाचन आयोग की वेबसाइट में साफ-साफ लिखा था – “Final Voter turnout of Phase 1,2,3 and 4 of the Lok Sabha Elections 2019”.

चुनाव आयोग की वेबसाइट का यह अंश

‘ द क्विंट ‘ के सवाल पूछने पर वेबसाइट से गायब हो गया । पांचवें, छठे और सातवें चरण के मतदान की बात कर ही नहीं जा रही है क्योंकि आयोग की वेबसाइट ने इन्हें ‘estimated’ data, यानी अनुमानित आंकड़ा बताया है।

27 मई को द क्विंट ने मेल कर निर्वाचन आयोग से आंकड़ों में फर्क के बारे में पूछा. निर्वाचन आयोग के एक अधिकारी ने द क्विंट से सम्पर्क भी किया और कहा कि जल्द हमें जवाब मिल जाएगा। उसी दिन द क्विंट ने पाया कि निर्वाचन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट eciresults.nic.in से “final voter turnout” का टिकर अचानक गायब हो गया। जब क्विंट ने निर्वाचन आयोग से पूछा कि वेबसाइट के टिकर से आंकड़े क्यों हटाए गए, तो आयोग ने कोई जवाब देना जरूरी नहीं समझा। उसी शाम क्विंट को आयोग से एक मेल मिला, जिसमे,  आयोग ने सिर्फ एक संसदीय क्षेत्र में वोटिंग में फर्क पर सफाई दी थी। आयोग  ने लिखा था कि आंकड़े अधूरे हैं. जल्द ही उन्हें दुरुस्त कर लिया जाएगा। एक बड़ी आश्चर्यजनक बात यह है कि नतीजों के ऐलान के चार दिन बाद भी (27 मई को) आयोग, द क्विंट से कहता है कि अभी वोटिंग के आंकड़े अधूरे हैं.

निर्धारित चुनावी प्रक्रिया के मुताबिक, पोलिंग बूथ के पीठासीन अधिकारी  को हर दो घंटे पर अपने वरिष्ठ अधिकारी को वोटिंग का आंकड़ा, मतदान प्रतिशत बताना होता है । तर्कों की बात करें, तो इस हालत में वोटिंग की जानकारी अपलोड करने में ज्यादा से ज्यादा कुछ दिन ही लगने चाहिए.

पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त ओपी रावत की बात माने तो ऐसे मामले पहले कभी नहीं आये हैं। अगर चुनाव प्रक्रिया, ईवीएम में कथित धांधली और मतगणना में हुयी अनियमितता की खबरों में उठते हुये सवालों का स्पष्टीकरण आयोग नहीं देता है और मुंह छिपा लेता है तो इससे यह संदेह और बढ़ेगा कि कहीं न कहीं मतगणना में गड़बड़ी हुयी है। इससे अफवाहें भी बहुत उड़ेंगी। इन सब संदेहों से आयोग की गिरी हुयी साख और गिरेगी। आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुनील अरोड़ा की क्षवि का जो कुछ भी होना है, वह तो होगा ही पर इससे जनादेश की शुचिता पर भी अनावश्यक रूप से सन्देह के बादल घिरेंगे।

निर्वाचन आयोग को एक सार्वजनिक शिकायत प्रकोष्ठ गठित कर जनता से अपने प्रति उठ रही शिकायतों को आमंत्रित करना चाहिये और फिर एक तय सीमा में उन पर अपना पक्ष और स्पष्टीकरण भी दे देना चाहिये। यह सब आरोप और स्पष्टीकरण आयोग की वेबसाइट पर रहना चाहिये, जिससे जनता, वस्तुस्थिति से अवगत हो जाय। ऐसी पारदर्शिता न केवल आयोग की साख को बढ़ाएगी बल्कि चुनाव प्रक्रिया में कथित धांधली से उठने वाले अफवाहों का भी शमन करेगी। सभी जनसरोकार से जुड़े विभागों में ऐसे शिकायत प्रकोष्ठ या ग्रीवांस रिड्रेसल मैकेनिज्म का प्राविधान होता है।

© विजय शंकर सिंह

साबुन-शैम्पू और टूथपेस्ट में झाग की उम्मीद बताती है, कि आपका मस्तिष्क भी नियंत्रण में हैं

साबुन और शैंपू में झाग की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन इसके बावजूद प्रोडक्ट निर्माता साबुन और शैंपू में ऐसे रसायन मिलाते हैं जिससे झाग बने, क्योंकि लोग जब नहाते और बाल धोते हैं तब उन्हें झाग निकलने की उम्मीद होती है। ये उम्मीद उनके अवचेतन में विज्ञापनों के माध्यम से बैठा दी गई है। जब झाग नहीं निकलते या कम निकलते हैं तो लोग उस साबुन और शैंपू को अगली बार नहीं खरीदते। साबुन और शैंपू की बिक्री के लिए उसमें झाग का बनना एक अनिवार्य गुण है जबकि उससे कोई भी फायदा हमें नहीं होता है। एक गैरजरूरी गुण को प्रोडक्ट का सबसे महत्वपूर्ण बना दिया गया है।

ऐसा ही टूथपेस्ट के साथ भी होता है कि दांतों को साफ और स्वस्थ रखने के लिए झाग की कोई उपयोगिता नहीं है। लेकिन फिर भी सभी कंपनियां इनमें आयुर्वेदिक कंपनियां भी शामिल है अपने टूथपेस्ट में सोडियम लॉरेथ सल्फेट मिलाती है जिससे कि मुंह में झाग उत्पन्न होते हैं। टूथपेस्ट इस्तेमाल करते समय लोग अपने मुंह में झाग के उत्पन्न होने की उम्मीद करते हैं और जब कोई टूथपेस्ट यह काम नहीं करता तो लोगों को अच्छा महसूस नहीं होता। उन्हें लगता है कि उनके दांत ठीक से साफ नहीं हुए हैं और कीटाणुओं का पूरा सफाया नहीं हो पाया है। वह ऐसा तब तक महसूस करते हैं जब तक कि किसी बहुत सारे झाग उत्पन्न करने वाले टूथपेस्ट से ब्रश ना कर लें। दाँतो में सनसनी होने को भी लोगों के अवचेतन में बैठा दिया गया है। अगर टूथपेस्ट करने से दांतों, मसूड़ों और मुंह में सनसनी ना हो तो भी लोगों को लगता है यह टूथपेस्ट बेकार है या इसमें कोई दम नहीं है और लोग उस टूथपेस्ट को खरीदना बंद कर देते हैं।

मतलब जो उपयोगी ही नहीं है ( कई विशेषज्ञ तो इस झाग को दांतों, त्वचा और बालों के लिए हानिकारक भी मानते हैं) वह सबसे महत्वपूर्ण गुण बना दिया गया है विज्ञापनों द्वारा। हमारे मस्तिष्क को हमारे ना चाहते हुए भी बदल दिया गया है। चार्ल्स डी. अपनी किताब ‘पॉवर ऑफ हैबिट’ में बताते हैं कि आदतों को न्यूरोलॉजिकल स्तर पर इच्छाएं पैदा करती हैं। कई बार यह इतनी धीमी गति से पैदा होती है कि लोग इसके अस्तित्व से अंजान रहते हैं। परिणाम स्वरूप हम इसके प्रभाव से अनभिज्ञ रहते हैं और इस आदत को सत्य समझने लगते हैं। लोगों को कुछ सपने दिखाकर या उम्मीद जगाकर उनके अंदर कोई भी आदत विकसित की जा सकती है। अमेरिका में महिलाओं को ‘पॉमऑलिव’ साबुन खरीदने के लिए यह कहकर विज्ञापनों में आकर्षित किया गया था कि इस साबुन को स्वयं प्राचीन मिस्र की मशहूर रानी क्लियोपैट्रा (उन्हें विश्व की सबसे सुंदर स्त्री माना जाता था) भी इसी साबुन से नहाती थी और इसी के कारण वे इतनी सुंदर थी अर्थात उनकी सुंदरता का कारण यह साबुन था। उनके दावों का उस वक्त के इतिहासकारों ने बहुत विरोध किया लेकिन उनका विरोध महिलाओं में जागी सुंदर बनने की उम्मीदों के आगे हार गया और पॉमऑलिव साबुन लोकप्रियता के शिखर पर विराजमान रहा।

हमारी आदतें ऐसे नहीं बदलती वह हमारे मन में क्रांतिकारी बदलाव की अपेक्षा रखती है और उन्हें क्रांति के अलावा कोई नहीं बदल सकता। याद रखें आदतें हमारी आज्ञा की प्रतीक्षा नहीं करती वे हमारी आज्ञा के बिना भी विकसित की जा सकती हैं। और हम देख रहे हैं की वे विकसित की जा रही हैं… रोजाना हर विज्ञापन के साथ। हमारा दिमाग आलसी होता है। वह हमेशा काम करने के कम मेहनत वाले तरीके ढूंढता रहता है। दिमाग हर प्रक्रिया को आदत बना सकता है क्योंकि इससे दिमाग के बाकी हिस्सों का आराम मिलता है, क्योंकि रोज़ाना सोच समझकर सारे काम करने से सोचिए इसे कितनी मेहनत करना पड़ती, हर वक़्त आपको सचेत रखना पड़ता। जूते के फीते बांधने से लेकर कार चलाने तक सभी काम को बहुत ध्यान से करना पड़ता… रोज़ाना! इन आदतों के निर्माण के लिए दिमाग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा काम करता है जिसका नाम है ‘बेसल गैंगलिओन’। यही दिमाग का वह भाग है जिसपर मल्टीनेशनल कंपनियों, विज्ञापन निर्माताओं और राजनेताओं की नज़र है। थोड़ा संभालकर रखियेगा इसे पाठकों, क्योंकि कोई आपको आदतों का गुलाम बना सकता है।

~डॉ अबरार मुल्तानी
लेखक, चिंतक और चिकित्सक