कविता – रास्ते का सबक मंज़िल का पैगाम होता है

आदमी से बड़ा आदमी का काम होता है जैसे राम से बड़ा राम का नाम होता है शक्ल से खुलता नही वजूद किसी का सूरत का नही ज़माना हुनर का गुलाम होता है काम से ही मिलती है पहचान सभी को खास बन जाये शख्स जो आम होता है रास्ता लंबा पांव छोटे है तो क्या हुआ छोटी छोटी कोशिशों का बड़ा अंजाम होता है … पढ़ना जारी रखें कविता – रास्ते का सबक मंज़िल का पैगाम होता है

किसान पर कविता- दिल्ली का सिंहासन डोल उठेगा

किसान बेटा जब बोल उठेगा जिस दिन किसान का बेटा बोल उठेगा…. दिल्ली का सिंहासन डोल उठेगा…. मिट्टी में मिल जायेंगे तख्तो ताज तुम्हारे… जिस दिन किसान का बेटा भी, किसान एकता बोल उठेगा….!! अभी रो रहा है,वो बात बात पे… अभी सो रहा है ,वो दिल्ली घाट पे.. अभी गुमराह ही रहा है,वो बात बात पे.. पर जिस दिन वो बोल उठेगा…. दिल्ली का … पढ़ना जारी रखें किसान पर कविता- दिल्ली का सिंहासन डोल उठेगा

मुस्लिम समाज, मुशायरे की भीड़ और विकास

इस कौम को “मुशायरों” ने क्या दिया? क्या दिया इन राजनीतिक मुशायरों ने,जिसकी तैयारीयों में लाखों रुपये खर्च कर ‘माहौल’ बनाया जाता है,और जिस पार्टी का ये मुशायरा है उस पार्टी के ‘नेता’ को सेक्युलर बनाया जाता है,क्यों किसलिए कौम के नाम पर “लाखों” रुपये मुशायरों में फूंकें जातें है? क्या मिलता है इससे मुस्लिमों को?क्या मुस्लिम समाज की शिक्षा का स्तर सुधर जाता है? … पढ़ना जारी रखें मुस्लिम समाज, मुशायरे की भीड़ और विकास

ग़ज़ल- मुसव्विर हूं सभी तस्वीर में मैं रंग भरता हूं

हमेशा ज़िन्दगानी में मेरी ऐसा क्यूं नहीं होता जमाने की निगाहों में मैं अच्छा क्यूं नहीं होता उसूलों से मैं सौदा कर के खुद से पूछ लेता हूँ मिरी सांसे तो चलती हैं मै ज़िंदा क्यूं नही होता हरिक को एक पगली बेटा कह कर के बुलाती है मगर उस भीड़ में तब कोई बेटा क्यूं नहीं होता गये गुज़रे ज़माने की कहानी क्यों बताता … पढ़ना जारी रखें ग़ज़ल- मुसव्विर हूं सभी तस्वीर में मैं रंग भरता हूं

कविता – दिल का समंदर

तेरे दिल का समंदर है गहरा बहुत पर डुबाने को मुझको ये काफी नहीं कल फिर तुम तोड़ोगी वादा कोई फिर कहोगी गलती मैंने की माफ़ कर दो मुझे और आगे से गलती फिर होगी नहीं तेरे दिल का समंदर है गहरा बहुत पर डुबाने…. कुछ कहता हूँ मैं तुम सुनो ध्यान से तोड़ा अब फिर से जो तुमने वादा कोई जायेंगे भूल हम भी … पढ़ना जारी रखें कविता – दिल का समंदर

कविता – इश्क के शहर में

मेरी बातें तुम्हें अच्छी लगतीं, ये तो हमको पता ना था तुम हो मेरे हम हैं तुम्हारे, ये कब तुमने हमसे कहा जिस दिन से है जाना मैंने आपकी इन बातों को ना है दिन में चैन कहीं, न है रातों को.. पहली बार जो तुमको देखा, दो झरनों में डूब गए बाँहों से तेरी हुए रूबरू, तो खुद को ही भूल गए जिस दिन … पढ़ना जारी रखें कविता – इश्क के शहर में

गज़ल – गुज़र गई है मेरी उम्र खुद से लड़ते हुए – “ख़ान”अशफाक़ ख़ान

गुज़र गई है मिरी उम्र खुद से लड़ते हुए मुहब्बतों से भरे वो खतों को पढ़ते हुए धुएं की तरह बिखरता रहा फज़ाओं में के उम्र बीत गई हवा संग उड़ते हुए बिखर गए हैं मिरे ख्वाब सह्र होते ही मैं देखता हूं सभी ख्वाब यार जगते हुए खुदा ए बंद से इतनी दुआ है मेरी बस ज़ुबाँ से कलमा शहादत रवाँ हो मरते हुए … पढ़ना जारी रखें गज़ल – गुज़र गई है मेरी उम्र खुद से लड़ते हुए – “ख़ान”अशफाक़ ख़ान

कविता: नील में रंगे सियार, तुम मुझे क्या दोगे ? – सतीश सक्सेना

अगर तुम रहे कुछ दिन भी सरदारी में , बहुत शीघ्र गांधी, सुभाष के गौरव को गौतम बुद्ध की गरिमा कबिरा के दोहे , सर्वधर्म समभाव कलंकित कर दोगे ! कातिल, धूर्त, अंगरक्षक , धनपतियों के नील में रंगे सियार, तुम मुझे क्या दोगे ? दुःशाशन दुर्योधन शकुनि न टिक पाएं ! झूठ की हांडी बारम्बार न चढ़ पाए, बरसों से अक्षुण्ण रहा था, दुनियां … पढ़ना जारी रखें कविता: नील में रंगे सियार, तुम मुझे क्या दोगे ? – सतीश सक्सेना