हादिया केस में लव था, “जिहाद” नहीं – NIA

NIA ने अपनी तसल्ली करके बता दिया कि हदिया केस में लव था , जिहाद नही। याद रहे हदिया केस लव जिहाद के नाम पर कुप्रचारित किया गया था इसमे 2 एडल्ट्स ने अपनी मर्ज़ी से शादी की थी। यह इतना मामूली केस था कि जितना हल्का आप सबने ” ठीक है, ई हमको नाही, हम इनको लेके भागे है, ठीक है, नून रोटी खाएंगे” … पढ़ना जारी रखें हादिया केस में लव था, “जिहाद” नहीं – NIA

विचार – प्रेम की ज्योति को जलाने की ज़रूरत है

बदलते परिवेश में बहुत कुछ बदल चुका है संघर्ष के मायने ,सत्य का अर्थ सच्चाई ,अहिंसा सब कुछ अपने अपने वास्तविक अर्थो से परे हो गए है। हिंसा अब अहिंसा का अंग बन गई और असत्य अब सत्य से आगे चलता है। भावना ,संवेदना सिर्फ दिखावे तक ही सीमित है ये सब व्यक्तिगत स्वार्थ के पीछे छुप गए । समय के बंधनों में इस कदर … पढ़ना जारी रखें विचार – प्रेम की ज्योति को जलाने की ज़रूरत है

ऑनर किलिंग के दंश से कब बाहर निकलेगा देश ?

देश की राजधानी दिल्ली में 23 वर्षीय अंकित की प्रेम प्रसंग के चलते की गई हत्या पर. अंकित फोटोग्राफर था और ‘ऑवारा ब्वॉयज’ नाम से यू ट्यूब चैनल चलाता था. पत्राचार से ग्रेजुएशन करने वाली मुस्लिम समुदाय की 20 वर्षीय लड़की से उसे प्रेम हुआ. आरोप है कि लड़की के घरवालों ने अंकित की सरेराह गला रेत कर हत्या कर दी. इस आरोप में पुलिस … पढ़ना जारी रखें ऑनर किलिंग के दंश से कब बाहर निकलेगा देश ?

मुहब्बत में “मैं ” को मारना पड़ता है

मोहब्बत क्या है? किसी को पाना या खुद को खो देना..! इश्क़, मोहब्बत प्रेम इस दुनिया का सबसे दिलचस्प और सबसे भ्रामक विषय है.. जितने लोग उतने एहसास.. उतनी बातें..! प्रेम दुखदायी भी हो सकता है, क्योंकि इससे आपके अस्तित्व को खतरा है.. जैसे ही आप किसी से कहते हैं, ’मुझे तुमसे मोहब्बत है.. वैसे ही आप अपनी पूरी आजादी खो देते हैं.. क्योंकि उस … पढ़ना जारी रखें मुहब्बत में “मैं ” को मारना पड़ता है

कविता – इश्क के शहर में

मेरी बातें तुम्हें अच्छी लगतीं, ये तो हमको पता ना था तुम हो मेरे हम हैं तुम्हारे, ये कब तुमने हमसे कहा जिस दिन से है जाना मैंने आपकी इन बातों को ना है दिन में चैन कहीं, न है रातों को.. पहली बार जो तुमको देखा, दो झरनों में डूब गए बाँहों से तेरी हुए रूबरू, तो खुद को ही भूल गए जिस दिन … पढ़ना जारी रखें कविता – इश्क के शहर में

कविता – बस स्मृति हैं शेष

अति सुकोमल साँझ- सूर्यातप मधुर; सन्देश-चिरनूतन, विहगगण मुक्त: कोई भ्रांतिपूर्ण प्रकाश असहज भी, सहज भी, शांत अरु उद्भ्रांत… कोई आँख जिसको खोजती थी! पा सका न प्रमाण; युतयुत गान; मेरे प्राण ही को बेधते थे| शांति और प्रकाश, उन्मन वे विमल दृग्द्वय समय की बात पर संस्थित मुझे ही खोजते थे| मैं न था, बस एक उत्कंठा मुझे घेरे खड़ी थी! व्याप्त करती श्वास प्रति … पढ़ना जारी रखें कविता – बस स्मृति हैं शेष