कविता – मुझे कागज़ की अब तक नाव तैराना नहीं आता

तुम्हारे सामने मुझको भी शरमाना नहीं आता के जैसे सामने सूरज के परवाना नही आता ये नकली फूल हैं इनको भी मुरझाना नही आता के चौराहे के बुत को जैसे मुस्काना नही आता हिजाबो हुस्न की अब आप क्यों तौहीन करते हो किसी को सादगी में यूँ गज़ब ढाना नहीं आता फकीरों की जमातों में मैं शामिल हो गया हूँ पर मुझे वोटों की खातिर … पढ़ना जारी रखें कविता – मुझे कागज़ की अब तक नाव तैराना नहीं आता

कविता – इश्क के शहर में

मेरी बातें तुम्हें अच्छी लगतीं, ये तो हमको पता ना था तुम हो मेरे हम हैं तुम्हारे, ये कब तुमने हमसे कहा जिस दिन से है जाना मैंने आपकी इन बातों को ना है दिन में चैन कहीं, न है रातों को.. पहली बार जो तुमको देखा, दो झरनों में डूब गए बाँहों से तेरी हुए रूबरू, तो खुद को ही भूल गए जिस दिन … पढ़ना जारी रखें कविता – इश्क के शहर में