कही रह ना जाना खामोश तुम

जैसे नदिया शांत होकर भी अपना जोहर दिखा जाती है,जैसे हवाओं की शांत लहरें हमे त्रीपत कर देती हैं ,क्या हम वैसे समाज मे जी रहे हैं ? लगता तो नहीं है फिर भी हम ज़िये जा रहे हैं पर क्यों ? दिल्ली विश्वविधालय की एक छात्रा जब अपनी आवाज उठाने के लिए एक मंच ढूंढती है तो क्यों उसको ज़लील किया जा रहा है,हम … पढ़ना जारी रखें कही रह ना जाना खामोश तुम