जातिगत प्रताड़ना – मुंबई में आदिवासी महिला डॉक्टर ने की आत्महत्या

मुंबई से एक महिला डॉक्टर की आत्महत्या का मामला सामने आया है, जिसमें आत्महत्या की वजह सीनियर डॉक्टर्स द्वारा जातिगत भेदभाव और टिप्पणियां व अपमान बताया जा रहा है. मृतक के परिजनों की रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने आरोपियों को आत्महत्या के लिए उकसाने की धारा लगाई गई  है. दरअसल मामला ये है, कि डॉक्टर पायल तडवी मुंबई के नायर अस्पताल के टॉपिकल नेशनल … पढ़ना जारी रखें जातिगत प्रताड़ना – मुंबई में आदिवासी महिला डॉक्टर ने की आत्महत्या

नज़रिया – क्या कहती है मध्यप्रदेश की आदिवासी राजनीती?

जिस राज्य की 24 प्रतिशत आबादी आदिवासी समुदाय की हो, वहाँ पर उनका प्रतिनिधित्व नगण्य हो, सुनकर अजीब लगता है. पर मध्यप्रदेश की कहानी ऐसी ही है. पिछले कई सालों से यहाँ आदिवासी समुदाय की राजनीतिक उपस्थिति नगण्य रही है. गोंड,प्रधान,भील और अन्य आदिवासी समुदायों की भारी तादाद प्रदेश में निवास करती है. महाकौशल, मालवा,निमाड़ घनी आदिवासी आबादी वाले क्षेत्र हैं. पर कांग्रेस से कांतिलाल … पढ़ना जारी रखें नज़रिया – क्या कहती है मध्यप्रदेश की आदिवासी राजनीती?

“दलित” शब्द के पीछे क्यों पड़े है कट्टरपंथी समूह ?

दलित शब्द दलन से अभिप्रेत है , जिनका दलन हुआ ,शोषण हुआ ,वो दलित के रूप में जाने पहचाने गये। दलित शब्द दुधारी तलवार है ,यह अछूत समुदायों को साथ लाने वाला एकता वाचक अल्फ़ाज़ है, इससे जाति की घेराबंदी कमजोर होती है और शोषितों की जमात निर्मित होती है, जो कतिपय तत्वों को पसंद नहीं है। दलित शब्द कुछ समूहों को अपराध बोध भी … पढ़ना जारी रखें “दलित” शब्द के पीछे क्यों पड़े है कट्टरपंथी समूह ?

आदिवासियों का मध्यप्रदेश की राजनीति में क्या रोल है ?

मध्यप्रदेश में लगभग 23 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है, पर विडंबना देखिये कि आज तक मध्यप्रदेश में किसी भी राजनीतिक पार्टी ने एक भी आदिवासी मुख्यमंत्री इस प्रदेश को नहीं दिए हैं. ज्ञात होकि मध्यप्रदेश के महाकौशल क्षेत्र (जबलपुर संभाग) और मालवा क्षेत्र (इंदौर एवं उज्जैन संभाग) में बड़ी आबादी आदिवासियों की निवास करती है. महाकौशल क्षेत्र के तो शासक आदिवासी ही रहे हैं, राजा … पढ़ना जारी रखें आदिवासियों का मध्यप्रदेश की राजनीति में क्या रोल है ?

“खरसावा हत्याकांड”, जहाँ आदिवासियों पर बरसाई गई थीं गोलियां

1 जनवरी 1948 को जब आज़ाद भारत अपने पहले नए साल की, पहली तारीख़ का जश्न मना रहा था, तब बिहार का खरसावां (अब झारखण्ड) में अपना ख़ून अपनो के द्वारा ही बहाया जा रहा था। 1 जनवरी 1948 खरसावां हाट में 50 हज़ार से अधिक आदिवासियों की भीड़ पर ओड़िशा मिलिट्री पुलिस ने अंधाधुंध फायरिंग की थी, जिसमें कई आदिवासी मारे गये थे। आदिवासी … पढ़ना जारी रखें “खरसावा हत्याकांड”, जहाँ आदिवासियों पर बरसाई गई थीं गोलियां

व्यक्तित्व – “बिरसा मुंडा”, एक नौजवान आदिवासी योद्धा

एक समान्य सी प्रचलित कहावत है, जो इन्सान अच्छा होता है उसको ईश्वर उसके भाग्य में समय ही कम लिखते है.  ऐसा ही थे बिरसा मुंडा. एक नौजवान जो एक छोटी अवधि के लिए जिए, पर जिए उतना जबर जिए.  25 वर्ष के जीवन में उन्होंने इतने मुकाम हासिल कर लिए थे कि आज भी भारत की जनता उन्हें याद करती है और भारतीय संसद … पढ़ना जारी रखें व्यक्तित्व – “बिरसा मुंडा”, एक नौजवान आदिवासी योद्धा

वर्षा डोंगरे केस – क्या उद्योगपतियो के सामने नत्मस्तक है सरकार

कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ फ़िर से चर्चा में था, लेकिन इस बार दुर्दांत नक्सलियों की वजह से नहीं बल्कि वजह थी राज्य सरकार की मूर्खता की वजह से, राजधानी रायपुर के सेन्ट्रल जेल की डेप्युटी जेलर सुश्री वर्षा डोंगरे जिन्होंने अपनी फ़ेसबुक वाल पे आदिवासी बच्चियों के जिस्म पे पुलिस बर्बरता की न सिर्फ दास्तान पोस्ट की बल्कि उनके मानवाधिकारों की बहाली और शांति क़ायम … पढ़ना जारी रखें वर्षा डोंगरे केस – क्या उद्योगपतियो के सामने नत्मस्तक है सरकार