मुज़फ्फ़रपुर में बिहार के माथे पर कभी न मिटने वाला कलंक लगा है

क्या पहेली है? आख़िर कारण क्या है? बिहार के माथे पर कभी न मिटने वाला कलंक लगा है। पूरा देश स्तब्ध है कि बिहार के समाज और वहां के बुद्धिजीवियों को क्या हुआ है? वे क्यों छिपते फिर रहे हैं? किसी से नज़र क्यों नहीं मिला पा रहे?

मुजफ्फरपुर के बालिका आश्रय गृह में नितीश सरकार के संरक्षण में 34 बच्चियों के साल-दर-साल, प्रतिदिन बार-बार नृशंस बलात्कार की इतनी बड़ी घटना उजागर हुई, जिसमें राज्य के सबसे ताक़तवर लोगों की संलिप्तता सामने आयी है। यह आशंका है कि बलात्कार और हिंसा का शिकार हुई बच्चियों की संख्या सैकड़ों में हो सकती है, और इस अपराध का फलक बहुत व्यापक हो सकता है।

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देश भर के संवेदनशील लोग इस घटना से आक्रोशित हैं, पर कुछ लोगों को छोड़ कर बिहार के अधिकाश साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी, रंगकर्मी, पत्रकार और बुद्धिजीवी जैसे संज्ञाशून्य हो गये हैं। उनकी घिग्घी बंध गयी है। ऐसा लगता है जैसे वे किसी बहुत बड़ी सांसत में फंस गये हों।

इप्टा, जलेस, प्रलेस, जसम जैसे कथित वामपंथी-जनवादी संगठनों को क्या हुआ है? वे विरोध-प्रतिरोध में कुछ करने की बात तो दूर, इस सांस्थानिक बर्बरता और संगठित अपराध के बारे में कुछ भी आधिकारिक तौर पर बोलने से क्यों कतरा रहे हैं? क्या कारण हो सकता है? उन्हें किस बात का इन्तज़ार है?

क्या यह उनके सरोकार और चिन्ता का विषय नहीं है? क्या वे नितीश सरकार से डर गये हैं? क्या बिहार में फासीवाद आ गया है? क्या बलात्कार की पीड़ित बच्चियों का अनाथ या अज्ञात कुल-गोत्र का या जातिविहीन होना उन्हें संवेदित नहीं कर पा रहा? क्या ऐसी बच्चियों के साथ ऐसी बर्बरता को वे सामान्य सामाजिक परिघटना मान रहे हैं?

क्या बलात्कार के आरोपियों का उच्च सवर्ण होना उन्हें विरोध से रोक रहा है? क्या अधिकांश वामपंथी-जनवादी संगठनों का सवर्ण और ब्राह्मणवादी नेतृत्व इस भयावह घटना को तूल न देने के लिये अपनी ताक़त लगा रहा है?

क्या बिहार के संस्कृतिकर्मी, रंगकर्मी, साहित्यकार और वामपंथी सांस्कृतिक संगठन नितीश सरकार के साथ किसी गुप्त डील या क़रार से बंधे हुए हैं? क्या कोई राजनीतिक मज़बूरी आड़े आ रही है? क्या कोई बहुत बड़ा आर्थिक हित है जो कुछ बोलने से प्रभावित होगा?

कुछ समझ में नहीं आता। कोई समझाने के लिये भी आगे नहीं आता। उन बच्चियों का क्या होगा, उन्हें न्याय कैसे मिल पायेगा? नितीश कुमार और उनकी सरकार के रहते बच्चियों को न्याय मिलना संभव नहीं लगता। वे अपने ही ख़िलाफ़ गड्ढा क्यों खोदने देंगे?

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