मंदसौर गोलीकांड का एक साल – किसानों की बदहाली और विकास गाथा

सरकार द्वारा मंदसौर में किसानों की हत्या को कल पूरे एक साल हो रहे हैं। लेकिन पिछले एक साल में किसानों की दशा सुधारने की ओर क्या किया सरकार ने?

राज्य से लेकर केंद्र सरकार तक विधायकों और सांसदों की आय तो रातोंरात दुगूनी कर देती हैं लेकिन जो सरकार किसानों को लागत का डेढ़गुणा ज्यादा MSP देने का वादा करने के बाद सत्ता में आती है वह किसानों को बेवकूफ समझते हुए लागत मूल्यों की परिभाषा ही बदल देती है। सरकार की निष्क्रियता और असफलताओं को बयान करने बैठा जाए तो आज के दिन के साथ न्याय नहीं होगा। इसलिए आज सिर्फ किसानों की बात करेंगे।

किसानों के प्रदर्शन के ख़िलाफ़ बीजेपी के नेताओं के ओछे बयान उनकी इनसेंसिटिविटी को बताते हैं। आज देश में एक मण्डी ऐसी नहीं है जहाँ किसानों की फसलें #MSP पर बिक रही हों। #JaiKisanAndolan के द्वारा चलाये जा रहे #MSPSatyagraha और #MSPAlert#MSPLootCalcoolator वग़ैरह के ज़ारी किये गए आँकड़ों से पता चलता है कि देश के हर राज्य की हर मण्डी में किसानों को उनकी फ़सलों पर हज़ारों करोड़ रुपयों का नुकसान हो रहा है। मण्डी में फसल बिकने का इंतेज़ार करते किसानों के प्राण निकल रहे लेकिन फसल नहीं बिक रही। जहाँ एक तरफ फसल नहीं बिकती वहीं दूसरी तरफ ऋण न चुका पाने की हालत में बैंकों के बढ़ते ज़ुल्म कम होने का नाम नहीं ले रहे।

1 जून से 10 जून तक देश के 20 राज्यों में किसानों की “गाँव बंद” मुहिम ज़ारी है। गाँव बंद के दौरान गाँव से शहरों को आने वाली सारी सुविधाओं को रोक दिया गया है। किसानों को उनकी फसल की बिक्री पर कोई फ़ायदा नहीं हो रहा जिसके ग़ुस्से में वह अपने ख़ून पसीने से उपजाई फसलों को बर्बाद कर रहे हैं। फसल का सही दाम नहीं मिलता तो किसान बैंकों का ऋण कैसे चुकाएंगे, अपना घर कैसे चलाएंगे, बच्चों को पढ़ाएंगे कैसे। और इन्हीं सवालों के चक्रव्यूह में फँसकर हमारे अन्नदाता आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते हैं।

कुछ लोग एयर कंडीशनर कमरों में बैठकर बड़े ही आराम से कह देते हैं कि किसान मीडिया कवरेज की लालच में आत्महत्या करते हैं, जब किसान क़र्ज़ चुका नहीं सकतें तो इतना लेते क्यों हैं, वो कहते हैं किसान क़र्ज़ वापस न करने का सोचकर ही लेते हैं।

बताइये ज़रा क्या आप मीडिया कवरेज़ के लिए ख़ुद को फाँसी पर लटका देंगे? और मीडिया कवरेज़ उन्हें चाहिए क्यों भला, उन्हें घर घर जाकर शक्ल दिखाकर वोट थोड़े ही लेना है कि मीडिया कवरेज़ से उनकी पहचान बढ़ेगी।

किसानी के विज्ञान को समझिए कि किसानों को क़र्ज़ की ज़रूरत क्यों पड़ती है आज। हाई यिल्डिंग वरायटी की बीज से प्राप्त फसलों को दोबारा बीज के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है, इन बीजों को बोने से फसल के कटने तक अलग अलग तरह के पेस्टीसाइड और फर्टिलाइजर की ज़रूरत पड़ती है, ज़्यादा मात्रा में पानी चाहिए होता है। ट्रैक्टर से लेकर थ्रेसिंग तक का किराया और कीमत बढ़ गई है। पिछली फसल की बिक्री पर इतना दाम नहीं मिला होता कि उसे बचाकर उसका इस्तेमाल अगली फसल में पूँजी के रूप में किया जाए। लोन लेना किसानों की मर्ज़ी नहीं मजबूरी होती है।

हमारे किसान आत्मसम्मान से इस क़दर लबरेज़ होते हैं कि बैंक का लोन न पूरा कर पाने की हालत में आत्महत्या कर लेते हैं और लोग कहते हैं वह क़र्ज़ वापस ही नहीं करना चाहते हैं। सरकार! क़र्ज़ लेकर वापस न करने की मानसिकता वाले लोग सीना ठोक कर विदेशों को जाते हैं आत्महत्या नहीं करते।

ठहर कर सोचिये ज़रा किसी शख़्स पर क्या बीतेगी जब उसके ख़ून पसीने और महीनों की कमाई जिससे उसके घर का साल भर का ख़र्चा चलना था, लुट जाए, जल जाए या बर्बाद हो जाए। सोचिए ज़रा आख़िर क्या मजबूरी है हमारे किसानों के सामने कि वे लोग अपने हाथों से अपनी फसलों अपने उत्पादों को बर्बाद कर रहे हैं। आख़िर क्या मजबूरी है कि हर 35- 40 मिनट में एक किसान आत्महत्या कर रहा है देश में।

6 जून 2018 को “अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति” के सभी सदस्य मंदसौर में किसानों की हत्या के ख़िलाफ़ उपवास पर बैठेंगे। आपको शायद पता ही होगा कि प्रशासन ने अबतक मंदसौर के उन अधिकारियों के ख़िलाफ़ एफआईआर भी नहीं दर्ज की जिन्होंने किसानों पर गोलियां चलाई थी और जिसमें 6 किसानों की मौत हो गई थी। अगर आज हम सबने मिलकर इन किसानों का साथ नहीं दिया तो कल हमारे पास खाने को “देशी” तो कुछ नहीं बचेगा।

किसी देश का विकास वहाँ के हर वर्ग, हर तबके, हर पेशे के लोगों के विकास पर निर्भर करता है न कि किसी विशेष वर्ग, विशेष तबके और विशेष पेशे के मुट्ठी भर लोगों के विकास पर।

नोट – यह लेख लेखिका की फ़ेसबुक वाल से लिया गया है

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