व्यक्तित्व – “गोपाल कृष्ण गोखले” को गांधी जी और जिन्ना मानते थे अपना राजनीतिक गुरु

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान स्वतंत्रता सेनानी  रहे गोपाल कृष्ण गोखले की 9 मई को 149 वीं जयंती है.गोपाल कृष्ण गोखले एक स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ ही एक मंझे हुए राजनीतिज्ञ भी थे.

गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9 मई 1866 ई में  महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिला, तालुका गुहागर के कोथलुक नामक गांव में हुआ था.एक गरीब ब्राह्मण परिवार में जन्में गोखले जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा एक अंग्रेजी विद्यालय से की. उनके पिता चाहते थे कि गोखले अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सके और ब्रिटिश राज में कोई छोटी-मोटी नौकरी कर सकें.

अपना ग्रैजुएशन एल्फींस्टन कॉलेज से पूरा करने के बाद गोपाल कृष्ण गोखले न्यू इंगलिश स्कूल, पुणे में अंग्रेजी के अध्यापक नियुक्त हुए. अंग्रेजी भाषा से निकटता होने के कारण गोपाल कृष्ण गोखले जॉन स्टुअर्ट मिल और एडमंड बुर्के के राजनैतिक विचारों से काफी प्रभावित हुए थे. हालांकि गोपाल कृष्ण गोखले बेहिचक अंग्रेजी शासन के विरुद्ध अपनी आवाज उठाते रहे लेकिन फिर भी उन्होंने आजीवन अंग्रेजी भाषा और राजनैतिक विचारों का सम्मान किया था.

राजनीति में प्रवेश और तिलक से विवाद

गोखले पुणे के फर्ग्युसन कॉलेज के संस्थापक सदस्यों में से एक थे.फर्ग्युसन कॉलेज में अध्यापन कार्य करते हुए गोपाल कृष्ण गोखले समाज सुधारक महादेव गोविंद रानाडे के संपर्क में आए जिन्होंने गोखले को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए प्रेरित किया. रानाडे के शिष्य के तौर पर गोपाल कृष्ण गोखले ने वर्ष 1889 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की.

गोपाल कृष्ण गोखले पर गोविंद रानाडे का बहुत प्रभाव था. उन्होंने एक बार कहा था –

‘मैं रानाडे साहब के साथ मिलकर गलत काम करके भी संतुष्ट हूं, पर उनसे अलग होकर मैं कोई काम नहीं करूंगा.’

गोखले के पार्टी में प्रवेश करने से पहले ही बाल गंगाधर तिलक, एनी बेसेंट, लाला लाजपत राय, दादाभाई नैरोजी कांग्रेस में शामिल थे. गोखले ने अपनी एक विशिष्ट राजनैतिक पहचान बनाने के लिए बहुत प्रयास किया. स्वभाव से नरम गोखले आम जनता की आवाज ब्रिटिश सरकार तक पहुंचाने के लिए पत्रों और वैधानिक माध्यमों का सहारा लेते थे. भारतीय लोगों को अधिकार दिलवाने के लिए वह वाद-विवाद और चर्चाओं का पक्ष लेते थे.

वर्ष 1894 में आयरलैंड जाने के बाद गोखले एल्फ्रेड वेब्ब से मिले और उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के लिए राजी किया. इसी वर्ष गोखले और बाल गंगाधर तिलक भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सह-सचिव बनाए गए. गोपाल कृष्ण गोखले और बाल गंगाधर तिलक दोनों ही ब्राह्मण थे और एलफिंस्टन कॉलेज के पूर्व छात्र थे. इसके अलावा दोनों डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी के महत्वपूर्ण सदस्य और गणित के अध्यापक भी थे. इतनी समानताओं के बावजूद गोखले और तिलक में अत्याधिक भिन्नताएं भी थीं. जहां गोखले विचार-विमर्श और बातचीत को अपनी बात मनवाने का जरिया समझते थे वहीं तिलक उग्र राष्ट्रवादी थे. वह ऐसे तरीकों को कायरता के रूप में ही देखते थें.

1891-92 में जब अंग्रेजी सरकार द्वारा लड़कियों के विवाह की उम्र दस वर्ष से बढ़ाकर बारह वर्ष करने का बिल पास करवाने की तैयारी शुरू हुई तब गोखले ने अंग्रेजों के इस कदम का पूरा साथ दिया लेकिन तिलक इस बात पर विरोध करने लगे कि भारतीयों के आंतरिक मसले पर अंग्रेजों को दखल नहीं देना चाहिए. इस मुद्दे पर गोखले और बाल गंगाधर तिलक के बीच विवाद उत्पन्न हो गया. इस विवाद ने कांग्रेस को दो गुटों में विभाजित कर दिया. एक गरमपंथी और दूसरा नरमपंथी.

सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी

वर्ष 1905 में गोपाल कृष्ण गोखले अपने राजनैतिक लोकप्रियता के चरम पर थे. उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया. इसके बाद उन्होंने भारतीय शिक्षा को विस्तार देने के लिए सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की स्थापना की. गोखले का मानना था कि स्वतंत्र और आत्म-निर्भर बनने के लिए शिक्षा और जिम्मेदारियों का बोध बहुत जरूरी है. उनके अनुसार मौजूदा संस्थान और भारतीय नागरिक सेवा पर्याप्त नहीं थी. इस सोसाइटी का उद्देश्य युवाओं को शिक्षित करने के साथ-साथ उनके भीतर शिक्षा के प्रति रुझान भी विकसित करना था. मोबाइल लाइब्रेरी, स्कूलों की स्थापना और मजदूरों को रात्रि शिक्षा प्रदान करना सर्वेंट्स ऑफ इंडिया का मुख्य कार्य था.

गांधी और जिन्ना मानते थे अपना राजनैतिक गुरु
सन् 1912 में गांधीजी के आमंत्रण पर गोखले ने दक्षिण अफ्रीका की यात्रा की.यात्रा के बाद गांधी और गोखले ने एक साथ कई महीने साथ बिताएं.उस दौरान गांधी जी नए-नए बैरिस्टर बने थे और साउथ अफ्रीका में अपने आंदोलन के बाद भारत लौटे थे. इसका जिक्र उन्होंने खुद अपनी आत्मकथा में किया था. उन्होंने भारत के बारे में और भारतीय विचारों को करीब से जानने व समझने के लिए गोखले का साथ चुना और उनके परामर्श के अनुसार कार्य किए.
वास्तव में गांधी जी को अहिंसा के जरिए स्वतंत्रता आंदोलन की प्रेरणा गोखले से ही मिली थी.उन्हीं की प्रेरणा से गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ आंदोलन चलाया.

इतिहासकार एच.एन. कुमार का कहना है कि अधिकतर लोग गोखले को सिर्फ महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु के रूप में ही जानते हैं लेकिन वह सिर्फ राष्ट्रपिता ही नहीं बल्कि मोहम्मद अली जिन्ना के भी राजनीतिक गुरु थे. उनका मानना है कि यदि आजादी के समय गोखले जीवित होते तो शायद जिन्ना देश के बंटवारे की बात रखने की हिम्मत नहीं जुटा पाते.

जन नेता कहे जाने वाले गोखले एक नरमपंथी सुधारवादी थे. उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान देने के साथ ही देश में व्याप्त जातिवाद और छुआछूत के खिलाफ भी संघर्ष किया.

वह जीवनभर हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए काम करते रहे और मोहम्मद अली जिन्ना ने भी उन्हें अपना राजनीतिक गुरु माना.इतना ही नहीं मुसलमानों के अध्यात्मिक गुरू आगा खान ने भी अपनी आत्म-कथा में यह लिखा है कि उनके विचार भी गोपाल कृष्ण गोखले के प्रभाव से अछूते नहीं रह पाए थे.

मृत्यु

जीवन के अंतिम वर्षों में भी गोपाल कृष्ण गोखले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भागीदारी निभाने के साथ सर्वेंट्स ऑफ इंडिया का नेतृत्व करते रहे. दिन-रात काम का दबाव और नई-नई परेशानियों के चलते वह बीमार रहने लगे.उन्होंने अपना सारा जीवन भारत को आजाद कराने और राजनैतिक सक्रियता में दे दिया.महज 49 वर्ष की उम्र में 19 फरवरी सन् 1915 को उनकी मृत्यु हो गई.

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