नज़रिया – बस इतना ही कहूँगा की “फरिशता लौट आया है”

ऑक्सीजन कि कमी के कारण बच्चों को तङपता देख एक डॉक्टर ने रात में भागदौड़ कर गैस सिलेंडर का इंतेज़ाम किया, सुबह तक अपनी गाड़ी में लाद कर सिलेंडर पहुंचाते रहे, जब कैश की बात आई तो खुद का एटीएम अपने सह कर्मचारी को दे दिया, बच्चों के परिजनों के रोने पर वो डाक्टर भी रो पङा, और अपनी सारी ताकतों को झौंक कर अपना फर्ज निभाने की कोशिश की।

लेकिन सरकार ने अपनी नपुसंकता को छुपाने के लिए पहले उन्हें काम से निकाल दिया, फिर जब बच्चों कि मौत पर सरकार से लगातार सवाल होते रहे तो उस डॉक्टर को ही दोषी बना दिया और उसे जेल भेज दिया गया, मीडिया ने उन्हें गोरखपुर ऑक्सीजन कांड का दोषी लिखा, इस सभ्य समाज के कुछ सभ्य लोगों ने भी उन्हें वीलेन कहने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं दिया। उस डॉक्टर को अपने आठ महीने जेल में गुजारने पङे, आखिर उन्हें जमानत मिल गई।

जेल से बाहर आकर उन्होंने जो कहा उसे सुनकर वहाँ खङे लोगों के साथ मीडिया कर्मी भी रो पङे।

डॉक्टर कफील खान ने कहा, ‘आठ महीने जेल में बिताने के बाद मैं मानसिक तौर पर परेशान हो चुका हूं और शारीरिक तौर पर बीमार महसूस कर रहा हूं। गोरखपुर जेल में 800 की क्षमता है लेकिन वहां 2000 से ज्यादा लोग रह रहे हैं। मुझे नहीं पता मेरी गलती क्या थी… मैंने वो सब किया जो एक बाप, एक डॉक्टर और एक हिंदुस्तानी का कार्यव्य होता है…. अरे कोई भी करता यार… मैंने तो कोशिस की थी बचाने की… ओर क्या किया था…? और आप सब तो थे न वहां पर, देखा नहीं था मुझे दौड़ते हुए? मेरा काम बच्चों का इलाज करना था, मैंने ऑक्सीजन सिलेंडरों की व्यवस्था करने की कोशिश की थी, क्योंकि तरल ऑक्सीजन समाप्त हो गया था।

साथ ही यह भी कहा कि, ‘जेल में आठ महीने मेरे लिए बहुत ही ज्यादा डरावने थे, मुझे बिना किसी कारण के खतरनाक अपराधियों के बीच रखा गया। ये बहुत ही बुरा था। मुझे नहीं पता मैंने क्या गलत किया था। इसके साथ ही कफील ने आग्रह किया, ‘मेरे नाम के आगे ऑक्सिजन कांड का ‘आरोपी’ लिखना बंद कर दें.

अब सोचिए ऐसे में कौन इंसानियत का फर्ज निभाने को आगे आएगा ? कफील के तो मानी ही “मदद करने वाला” होता है, काश उन बच्चो से ही पुछ लिया गया होता जो उनकी वजह से बचे थे, वो अपनी सांसों में ही जवाब दे देते।

खैर और कुछ नहीं लिखना है, बस इतना ही कहूँगा की “फरिशता लौट आया है”

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