भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई सत्यजीत रे ने

सत्यजीत रे, भारतीय फिल्मों में एक ऐसा नाम है जिसने अपने रचनात्मक काम से न सिर्फ भारत में बल्कि विश्व स्तर पर एक ऐसा मुकाम हासिल किया है जो भारत में शायद ही किसी फ़िल्मकार को हासिल हुआ हो.दुनिया के बेहतरीन फिल्मकारों में शामिल सत्यजीत रे की 23 अप्रैल को 26वीं पुण्यतिथि है.भारतीय सिनेमा जगत के युगपुरूष सत्यजीत रे एक ऐसे फिल्मकार थे जिन्होंने अपनी निर्मित फिल्मों से भारतीय सिनेमा जगत को अंतराष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान दिलाई.

सत्यजीत रे का जन्म कलकता में दो मई 1921 को एक उच्च घराने में हुआ था. उनके दादा उपेन्द्र किशोर रे वैज्ञानिक थे जबकि उनके पिता सुकुमार रे लेखक थे.सत्यजीत रे ने अपनी स्नातक की पढ़ाई कलकता के मशहूर प्रेसीडेंसी कॉलेज से पूरी की.इसके बाद अपनी मां के कहने पर उन्होंने रवीन्द्र नाथ टैगौर के शांति निकेतन में दाखिला ले लिया जहां उन्हें प्रकृति के करीब आने का मौका मिला.शांति निकेतन में करीब दो वर्ष रहने के बाद सत्यजीत रे वापस कलकत्ता आ गये.

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सत्यजीत रे ने अपने करियर की शुरूआत वर्ष 1943 में ब्रिटिश एडवरटाइजमेंट कंपनी से बतौर ‘जूनियर विजुलायजर’ से की जहां उन्हें 18 रूपये महीने बतौर पारिश्रमिक मिलते थे. इस बीच वह डी.के गुप्ता की पब्लिशिंग हाउस ‘सिगनेट प्रेस’ से जुड़ गये और बतौर कवर डिजायनर काम करने लगे. बतौर डिज़ाइनर उन्होंने कई पुस्तकों का डिज़ाइन तैयार किया इसमें जवाहर लाल नेहरू की ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ प्रमुख है.

वर्ष 1949 में सत्यजीत रे की मुलाकात फ्रांसीसी निर्देशक जीन रेनोइर से हुयी जो उन दिनों अपनी फिल्म ‘द रिवर’ के लिये शूटिग लोकेशन की तलाश में कलकता आये थे.जीन रेनोर ने सत्यजीत रे की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें फिल्म निर्माण की सलाह दी. वर्ष 1950 में सत्यजीत रे को अपनी कंपनी के काम के कारण लंदन जाने का मौका मिला जहां उन्होंने तकरीबन 100 अंग्रेजी फिल्में देख डालीं.इसी दौरान उन्हें एक अंग्रेजी फिल्म ‘बाइसाईकिल थीफस’ देखने का मौका मिला. फिल्म की कहानी से सत्यजीत रे काफी प्रभावित हुये और उन्होंने फिल्मकार बनने का फैसला कर लिया.

सत्यजीत रे बांग्ला साहित्यकार विभूति भूषण बंधोपाध्याय के उपन्यास ‘विलडंगसरोमन’ से काफी प्रभावित थे और उन्होंने उनके इस उपन्यास पर ‘पाथेर पांचाली’ नाम से फिल्म बनाने का निश्चय किया. फिल्म पाथेर पांचाली के निर्माण में लगभग तीन वर्ष लग गये. फ़िल्म निर्माण के क्रम में सत्यजीत रे की आर्थिक स्थिति काफी खराब हो गयी जिससे फिल्म निर्माण की गति धीमी पड़ गयी.बाद में पश्चिम बंगाल की सरकार के सहयोग से फिल्म को पूरा किया जा सका.

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वर्ष 1955 में प्रदर्शित फिल्म पाथेर पांचाली ने कोलकाता के सिनेमाघरों में लगभग 13 सप्ताह हाऊसफुल चली. इस फिल्म को फ्रांस में प्रत्येक वर्ष होने वाली प्रतिष्ठित कांस फिल्म फेस्टिबल में इसे ‘बेस्ट ह्यूमन डाक्यूमेंट’ का विशेष पुरस्कार भी दिया गया.

फिल्म पथेर पांचाली के बाद सत्यजीत रे ने फिल्म ‘अपराजितो’ का निर्माण किया. इस फिल्म में युवा अप्पू की महत्वाकांक्षा और उसे प्यार वाली एक मां की भावना को दिखाया गया है.फिल्म जब प्रदर्शित हुयी तो इसे सभी ने पसंद किया लेकिन मशहूर समीक्षक मृणाल सेन और ऋत्विक घटक ने इसे पाथेर पांचाली से बेहतर माना. फिल्म वीनस फेस्टिबल में गोल्डेन लॉयन अवार्ड से सम्मानित की गयी.

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वर्ष 1962 में सत्यजीत रे अपने दादा की पत्रिका ‘संदेश’ की एक बार फिर से स्थापना की. सत्यजीत रे की पहली रंगीन फिल्म ‘महानगर’ वर्ष 1963 में प्रदर्शित हुयी.कम लोगों को पता होगा कि जया भादुड़ी ने इसी फिल्म से अपने सिने कैरियर की शुरूआत की थी.

वर्ष 1966 में सत्यजीत रे की एक और उत्तम कुमार अभिनीत सुपरहिट फिल्म ‘नायक’ प्रदर्शित हुयी.फिल्म ने सफलता के नये कीर्तिमान स्थापित किये.फिल्म के प्रदर्शन के बाद सत्यजीत रे ने कहा था यदि उत्तम कुमार इस फिल्म में काम करने से मना करते तो वह फिल्म का निर्माण नहीं करते.

वर्ष 1969 में अपने दादा की रचित लघु कथा पर सत्यजीत रे ने “गूपी गायन बाघा बायन” का निर्माण किया.फिल्म टिकट खिड़की पर सुपरहिट साबित हुयी साथ ही बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय हुयी.

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वर्ष 1977 में सत्यजीत रे के सिने करियर की पहली हिंदी फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ प्रदर्शित हुयी.संजीव कुमार ,सईद जाफरी और अमजद खान की मुख्य भूमिका वाली यह फिल्म हालांकि टिकट खिड़की पर अपेक्षित सफलता नहीं अर्जित कर सकी लेकिन समीक्षकों के बीच यह काफी सराही गयी.

वर्ष 1978 में बर्लिन फिल्म फेस्टिबल की संचालक समिति ने सत्यजीत रे को विश्व के तीन सर्वश्रेष्ठ ऑल टाइम डायरेक्टर में एक के रूप में सम्मानित किया.अस्सी के दशक में स्वास्थ्य खराब रहने के कारण सत्यजीत रे ने फिल्मों का निर्माण करना काफी हद तक कम कर दिया. फिल्म ‘घरे बाइरे’ के निर्माण के दौरान उन्हें दिल का दौरा पड़ गया था. इसके बाद डाक्टर ने सत्यजीत रे को फिल्म में काम करने से मना कर दिया.लगभग पांच वर्ष तक फिल्म निर्माण से दूर रहने के बाद वर्ष 1987 में सत्यजीत रे अपने पिता सुकुमार रे पर एक वृतचित्र का निर्माण किया.

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सत्यजीत रे को अपने चार दशक लंबे सिने करियर में मान-सम्मान खूब मिला. उन्हें भारत सरकार की ओर से फिल्म निर्माण के क्षेत्र में विभिन्न विधाओं के लिए 32 बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया.सत्यजीत रे वह दूसरे फिल्म कलाकार थे जिन्हें ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा डाक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया.वर्ष 1985 में सत्यजीत रे को हिंदी फिल्म जगत के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके अलावे उन्हें भारत रत्न की उपाधि से भी सम्मानित किया गया.उनके चमकदार कैरियर में एक गौरवपूर्ण नया अध्याय तब जुड़ गया जब 1992 में उनके उल्लेखनीय कैरियर को देखते हुये उन्हें ऑस्कर के ‘लाइफ टाइम अचीवमेंट’ सम्मान से सम्मानित किया गया.

सत्यजीत रे ने अपने सिने करियर में 37 फिल्मों का निर्देशन किया. वर्ष 1991 में प्रदर्शित फिल्म ‘आंगतुक’ सत्यजीत रे के सिने करियर की आखिरी फिल्म साबित हुयी.अपनी निर्मित फिल्मों से अंतराष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाने वाले महान फिल्मकार सत्यजीत रे ने 23 अप्रैल 1992 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

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