मैं अफसर बन कर मेरी जैसी और लड़कियों की मदद करुँगी

जमीन पथरीली थी और सफर आसान नहीं था. मगर 16 साल की मंजू ने बाल उम्र में किये गए विवाह को इंकार कर दिया।मंजू को जब जबरन ससुराल भेजा गया, उसने बगावत कर दी और अपने सहपाठीयो से मदद की गुहार की। स्कूल के सहपाठीयो ने प्रशासन के सहयोग से मंजू की घर वापसी करवाई। अब मंजू पढ़ लिख कर अफसर बनना चाहती है। वो अपनी शादी को शून्य घोषित कराने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही है।

राजस्थान के जयपुर में एक कच्ची बस्ती में रहने वाली मंजू अब 11 वी कक्षा की विद्यार्थी है। मंजू कहती है सब कुछ ठीक चल रहा था और स्कूल पढ़ने जा रही रही थी। मगर सहसा पिछले को उसकी जिंदगी में झंझावात आ गया। वो बताती है जब वो महज दस साल की थी, वर्ष 2012 में 28 साल के एक व्यक्ति से विवाह कर दिया गया। मंजू कहती है बीते साल 30 मई को ससुराल वाले लेने आ गए और माँ बाप पर उसे भेजने के लिए दबाव डाला। वे जाति बिरादरी के आगे बेबस हो गए। मंजू कहती है वो रोते बिलखते ससुराल भेज दी गई।

मंजू के अनुसार ,उसने स्कूल में अपने सहपाठियों को संदेश भेज कर मदद के लिए गुहार की। वो कहने लगी ‘मेरे साथ पढ़ने वाले सात छात्र और छात्राये एक दम से मुझे ढूंढने पैदल ही निकल पड़े और जयपुर में ही मेरे ससुराल आ पहुंचे। वहां मैं इतना ही कह पाई कि मुझे बचालो। बाद इन सहपाठियों ने जैसे तैसे जयपुर कलेक्टर को खबर की और पुलिस की मदद से मुझे ससुराल से बाहर निकलवाया। मंजू जयपुर की झालाना कच्ची बस्ती में एक गैर सरकारी संगठन से संचालित अमर सेवा समिति के सखी बाल निकेतन में पढ़ती है।

इस संगठन के गोपाल राठोड कहते है उन्हें भी जब घटना का पता लगा तो बहुत रंज हुआ। लेकिन मंजू के लिए उसके सहपाठी बहुत मददगार साबित हुए। मंजू कहती है उनके समाज में इस घर लड़की दे और उधर से लड़की ले की प्रथा है। मेरे भाई की शादी के बदले मेरी जबरन शादी कर दी गई। इस प्रथा को आटे साटे यानि अदला बदली कहते है। स्कूल की संचालक सुनीता कहती है मंजू बहुत होनहार विद्यार्थी है।

मंजू कहती है उसके सर पर अब पिता का साया नहीं है और तीन भाई है जो मजदूरी करते है। वो बताती है माँ बाप मेरे साथ थे। मगर ससुराल न भेजने पर उन्हें बिरादरी के दबाव में ‘झगड़े की रस्म के साठ सत्तर हजार रूपये देने पड़ते। अपनी दास्ताँ सुनाते मंजू की आंखे भर आई। कहने लगी ‘मैं अफसर बन कर मेरी जैसी और लड़कियों की मदद करुँगी।

नोट – यह स्टोरी नारायण बरेठ जी की फ़ेसबुक वाल से ली गई है

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