आखिर “मोनालीसा” की पेंटिंग का क्या है राज़

प्रसिद्ध चित्रकार लियोनार्दो द विंची का जीवन जन्म से लेकर मृत्यु तक रहस्य के आवरण में लिपटा हुआ है. उनकी सबसे महत्वपूर्ण कृति मोनालिसा जो है तो एक पेंटिंग लेकिन दुनिया के रहस्यों में से एक है. इस पेंटिंग का राज़ आज तक कोई भी नहीं बता सका है.माना जाता है कि अलग़-अलग़ एंगल से देखने पर मोनालिसा की मुस्कुराहट बदलती रहती है. जानकारों का कहना है कि उस पेंटिंग में कई राज़ दफ़्न हैं.

मोनालिसा की पेंटिंग को किसी काग़ज़ या कपड़े पर नहीं बनाया गया है बल्कि उसे एक लकड़ी के टुकड़े पर बनाया गया है.वो लकड़ी आजकल स्केट बोर्ड बनाने के काम आती है. इस पेंटिंग को 1503 से लेकर 1519 तक के समय में बनाया गया यानि 16 साल लगे लियोनार्दो को इस पेंटिंग को बनाने में. लेकिन जब तक वो पेंटिंग पूरी होती लियोनार्दो का देहांत हो गया असल में इस पेंटिंग का नाम मोनालिसा नहीं है ये एक स्पेलिंग मिस्टेक है. असल में इसका नाम है मोनालिज़ा. इटली में मोनालिज़ा का मतलब होता है माई लेडी.

यह पेंटिंग बनाई गई तो इटली में थी लेकिन इसका गहरा नाता फ्रांस से भी रहा है.कला के कद्रदान तानाशाह नेपोलियन बोनापार्ट को ये पेंटिंग बहुत पसंद थी,इस वजह से नेपोलियन ने इस पेंटिंग को अपने बेडरूम में सजा रखा था.

लियोनार्दो को मोनालिज़ा की पेंटिंग अपनी सौ पेंटिंग्स में सबसे अधिक पसंद थी.लियोनार्दो जब भी कभी बाहर जाते तो अपने साथ इस पेंटिंग को साथ लेकर ज़रूर जाते.विंची ने जब इस पेंटिंग को बनाना शुरु किया था उस समय वो 51 साल के थे सन् 1797 में इस पेंटिंग को फ्रांस के एक म्यूज़ियम में लगाया गया.लेकिन ये किसी को नहीं पता कि वो पेंटिंग पेरिस के उस म्यूज़ियम में कैसे पहुँची 21 अगस्त 1911 में वो पेंटिंग म्यूज़ियम से चोरी हो गई. लेकिन 10 साल बाद वो पेंटिंग फिर से मिल गई.

पेंटिग के गुम होने और मिलने के सिलसिले के बीच सदियों का सफ़र अबतक बीत चुका है और पेंटिंग के शौकीनों और कला के क़द्रदानों के लिए बड़ी ख़बर ये है कि ये बेशक़ीमती पेंटिंग अब तक महफ़ूज़ है और इसकी हिफ़ाज़त सदियों से एक बड़ी चुनौती भी बनी हुई है.

वर्ष 1951 में एक आदमी ने इस  पेंटिंग पर पत्थर फेंका था जिसकी वजह से पेंटिंग के बाएं हाथ की कोहनी के सामने एक स्क्रेच आ गया और फिर इस पेंटिंग की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए फ्रांस की सरकार ने पेंटिंग की सुरक्षा के लिए Louvre Museum में एक विशेष कमरा बनाया है जिसका तापमान ऐसा रखा गया है जिस से पेंटिंग को कोई नुकसान न पहुंचे इस कमरे को बनाने  के लिए म्यूजियम ने तकरीबन 50 करोड़ रुपये खर्च किए.इस पेंटिंग को वह एक बुलेट प्रूफ शीशे के अंदर रखा गया है.

ये पेंटिंग बेशक़ीमती है फिर भी 14 दिसंबर 1962 में मोनालिज़ा की पेंटिंग की क़ीमत 100 मिलियन डॉलर यानि 680 करोड़ रुपए लगाई गई आज के समय में इसकी क़ीमत 790 करोड़ डॉलर की है यानि 5,380 करोड़ रुपए की.

आख़िर मोनिलिज़ा है कौन? पहले वैज्ञानिकों का ऐसा मानना था कि शायद विंची ने इसे बनाते समय मदर मैरी को ध्यान में रखा होगा या शायद उस पेंटिंग में विंची ने अपनी माँ का चेहरा बनाने की कोशिश की होगी. कुछ वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि शायद विंची ने उस पेंटिंग में स्वयं को एक महिला के तौर पर देखने की कोशिश की होगी. लेकिन इनमें से कुछ भी सच नहीं है. अगर हम उस दौर के लोगों को देखें तो मोनिलिज़ा की शक्ल उस दौर के किसी भी शख्स से नहीं मिलती. तो आख़िर मोनिलिज़ा में छुपी शख्सियत किसका चेहरा है.

सन 2005 में विंची के एक घनिष्ठ मित्र द्वारा उन्हें सन 1503 में लिखा गया एक पत्र मिला.जब वह पत्र लिखा गया उस वक्त विंची ज़ियाकोंडो की पेंटिंग पर काम कर रहे थे. ज़ियाकोंडो की पत्नी का नाम था लीज़ा ज़िया कोंडो. उस समय अपनी दूसरी संतान के जन्म समारोह के समय ज़ियाकोंडो ने लियानार्दो को अपनी पत्नी के लिए भी पेंटिंग बनाने को कहा तो उस पत्र के आधार पर हमें पता चलता है कि जिस समय वो पत्र लिखा गया विंची मोनिलिज़ा पेंटिंग पर काम कर रहे थे. लेकिन पूरी तरह से यह नही कहा जा सकता कि मोनिलिज़ा की पेंटिंग लीज़ा ज़ियाकोंडो की पेंटिंग है.

साल 2004 में एक वैज्ञानिक जिसका नाम पास्कल कोटे था. उन्होंने इस पेंटिंग की कई लेयर स्कैन करके निकाल लीं. ऐसा करने पर जो पता चला उसने सारी दुनिया को हैरान कर दिया. उससे ये पता चला कि जो पेंट विंची ने इस्तेमाल किया उसकी मोटाई 40 माइक्रो मीटर थी यानि एक बाल से भी ज़्यादा पतली. उस पेंटिंग में तीन परत हैं. जिसमें मोनिलिज़ा की पेंटिंग के नीचे किसी और इंसान की पेंटिंग छुपी है. हैरानी की बात ये है कि वो पेंटिंग लीज़ा कोंडो की शक्ल से बहुत मिलती-जुलती है. विंची ने लीज़ा की ही पेंटिंग बनाई थी पर उसे लीज़ा का चेहरा ख़ास पसंद नहीं था. इसी वजह से विंची ने उसे और मोडिफ़ाई करते हुए मोनिलिज़ा की तस्वीर उसी के ऊपर बना दी होगी.

अलग़-अलग़ ऐंगल से देखने पर मोनालीज़ा के चेहरे की मुस्कुराहट बदलती रहती है. संडरलैंड यूनिवर्सिटी ने एक बार अपने वॉलंटियर्स के साथ इस पेंटिंग का एक सर्वे किया. इस सर्वे में ये निकल कर सामने आया कि दूर से देखने पर ये पेंटिंग मुस्कुराती सी दिखती है. पर जब हम मोनालीज़ा के होंठो को देखते हैं तो वह थोड़ा झुके हुए से लगते हैं.जिस कारण मोनालीज़ा कुछ उदास सी लगती है।विंची ने इस पेंटिंग को बनाने में एक टेकनीक का इस्तेमाल किया है.जिसे सुफू मोटो कहते हैं. इस टेकनीक में किसी भी आउटलाइन का इस्तेमाल नहीं होता.और अगर आउटलाइन होती है तो उसे कई रंगों में मिला दिया जाता है. आज तक कोई भी इंसान इतने अच्छे ढंग से इस टेक्नीक का इस्तेमाल नहीं कर पाया. जितना विंची ने किया है. जब हम मोनालिज़ा की आंखों में देखते हैं तो वह एक खुशनुमा व्यक्ति की आँखें लगती हैं.लेकिन उसके होंठों को देखते हैं तो वहाँ मुस्कुराहट ग़ायब मिलती है. मोनिलिज़ा की पेंटिंग के अंदर एक छुपा हुआ संदेश भी है.

विंची को पेंटिंग के अंदर संदेश देना भी अच्छी तरह से आता था.मोनिलिज़ा की पेंटिंग के बाएं हाथ की तरफ़ एक छुपा हुआ मैसेज भी है. जब उसके हाथ पर फोकस कि गया तो वहां कुछ अक्षर पाए गए.जो विंची द्वारा उस पेंटिंग के लिए लिखे गए होंगे.अगर उन शब्दों को एक क्रम में लिखा जाए तो वो कुछ इटैलियन शब्द थे “La risposta si Trova Qui” जिसका अर्थ है उत्तर यहां है. यानि उस पेंटिंग में जो भी कुछ था उसका रहस्य बस खुलने वाला था. क्योंकि हमें उस जगह का पता चल गया था जहाँ ये राज़ छुपा हुआ था.जिस राज़ को बताने के लिए कई लोगों ने प्रयास किए हुए थे.

एक पैरानॉर्मल संस्था ने दावा किया था कि उस पेंटिंग में एक एलियन का चेहरा छुपा है. ये सुनने में बहुत ही अटपटा लगता है पर अगर मोनिलिज़ा के बाएं चेहरे को शीशे की मदद से जोड़ते हैं तो उसमें एक एलियन का चेहरा दिखता है.

बहरहाल सच क्या है यह अब भी दावे के साथ नही कहा सकता. शायद आने वाले समय में कुछ और बातें भी इस महान पेंटिंग के बारे में निकल कर आए.

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