धार्मिक रैलियों में उद्दंडता से भरपूर भड़काऊ गाने क्यों ?

मुझे लगता है, कि हमारे दिलों से धर्म का सम्मान निकल गया है, हमने धार्मिक रैलियों और शोभायात्राओं और अन्य सभी धार्मिक प्रोग्रामों से भजन के महत्व को लगभग समाप्त कर दिया है. हमारा पूरा ध्यान इस बात पर केन्द्रित होता है, कि डीजे वाला भैया, समुदाय विशेष को टारगेट करके कौन सा नारे वाला गाना बजा रहा है. क्या यह धर्म का अपमान नहीं है.

इन नारेबाज़ी वाले गानों का धर्म से मुझे कोई लेना देना समझ नहीं आता. क्या यह सनातन धर्म का अपमान नहीं है, कि समुदाय विशेष से नफ़रत की बिना पर इन्हें बजाय जाए. दूसरे समुदायों को लेकर नफ़रत का सबसे ज़्यादा ग्राफ हिंदी भाषी राज्यों में है, क्योंकि इन राज्यों की सर्वाधिक बेगारी है. लोग कम पढ़े लिखे हैं, जो पढ़े लिखे लोग हैं, वो भी सोशल में तथ्यों के बिना फैलाए जाने वाले झूठे मैसेजेज़ का शिकार हैं.

फ़िलहाल भोजपुरी सिनेमा देखने वाला दर्शक सर्वाधिक साम्प्रदायिकता का शिकार है. ऐसा नहीं है, कि दूसरे नही हैं, पर इस वर्ग का स्तर सर्वाधिक है. यही वर्ग यूट्यूब और सोशलमीडिया में समुदाय विशेष को टारगेट करके बनाये गानों को अपलोड कर रहा है. इस क्षेत्र के गायकों ने अपने -अपने यूट्यूब चैनल में भजन गायकी छोड़कर, यही भड़काऊ गाने अपलोड करना शुरू कर दिया है.

धार्मिक और राजनीतिक रैलीयों को समुदाय विशेष के विरुद्ध नारों के बिना भी निकाला जा सकता है. क्योंकि अक्सर धार्मिक रैलियों में समुदाय विशेष को टारगेट करने के बाद किसी भी शहर व क्षेत्र में माहौल खराब करने की कोशिशें की जाती हैं. फिर आखिर क्यों डीजे और साऊंड बॉक्स में बजने वाले इन भड़काऊ गानों पर पूर्णतः प्रतिबन्ध नही लगाया जाता है

आप देखियेगा, पिछले कुछ समय में पूरे हिंदी भाषी क्षेत्र में एक गाना कॉमन हर रैली में बजाया जाता रहा है. गाना है ” घर घर भगवा छाएगा, राम राज्य आयेगा”. इस गाने में आपत्तिजनक जो शब्द हैं, वो हैं – टोपी वाला भी जय श्री राम गायेगा.

वहीं एक गाना और है, जोकि हजारीबाग की रामनवमी उत्सव 2018 के नाम से यूट्यूब में उपलब्ध है. उसमें जिस तरह से समुदाय विशेष के लिए सरेआम नफ़रत परोसी गई है, वह बिलकुल भी हम सच्चे भारतीयों को स्वीकार्य नहीं है. उस गाने में खुलेआम क़त्लेआम की बात करके सामाजिक तानेबाण एको बिखेरने की साज़िश की गई है. यह देश की एकता और अखंडता के लिए बेहद ख़तरनाक है.

सुनें इस वीडियो के बोल और स्वयं फैसला लें, कि किस तरह की नफ़रत हमारे समाज में फैलाई जा रही है.

प्रश्न यह है, कि हम किसी दूसरे समुदाय और धर्मों को टारगेट करके यह क्या – क्या अपनी अगली पीढ़ियों को परोस रहे हैं. यह घटिया गाने धर्म का स्थान हरगिज़ नहीं ले सकते.

आप सोचियेगा, कि जब इन्ही रैलियों में भजन बजते थे, तो कितनी शांति मिलती थी. पर आजकल उद्दंडता से भरपूर गाने डीजे पर बजाये जाते हैं. इनसे न धर्म का भला है न समाज का.

हम किस दौर में चले आये हैं, जो इस तरह के उद्दंडता पूर्वक गाये जाने वाले गानों को भजनों के स्थान पर अपनी धार्मिक रैलियों में बजा रहे हैं.

भजन भगवान से जोड़ने वाले चीज़ है, और ये उद्दंडता से भरपूर नारे जो गाने के नाम पर बजाए जाते हैं. हमारी पीढ़ी के लिए एक अभिशाप बनते जा रहे हैं. यह हमें धर्म और समाज दोनों से दूर करते हैं. इस विषय पर सोचिये, धर्म को उद्दंडता से बचाईये और सनातन की रक्षा करें.

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