यूपी-बिहार में उपचुनाव के नतीजों के क्या हैं मायने ?

बिहार के बाद अब उत्तर प्रदेश में भी बीजेपी ने हार का मुँह देखा बिहार की एक और उत्तर प्रदेश की दो लोकसभा सीटों पर हार के बाद भाजपा को 2019 के लिए अलग रणनीति पर विचार करना पड़ेगा।  1991 के बाद बीजेपी पहली बार गोरखपुर सीट से हारी और 28 साल बाद गोरखपुर से मठ के बाहर का सांसद बना है।

उत्तर प्रदेश में गोरखपुर और फूलपुर में हुए चुनावो में धुर विरोधी माने जानी वाली पार्टी सपा और बसपा ने गठबंधन किया,यही संकेत है की भाजपा को हराने के लिए इस वक़्त विपक्षी दल कहीं तक भी जा सकते है, क्योंकि सपा और बसपा का मिलना नदी के दो किनारों के मिलने जैसा है।

लोकसभा की दोनों अहम सीटों पर जीत मिलने का बाद अखिलेश यादव को अपनी बुआ (मायावती) पर प्यार उमड़ा और जीत की बधाई देने वह उनके घर भी चले गए और बुआ कहकर उन्हें प्रणाम किया।

बुआ भतीजे की जोड़ी

अखिलेश की मायावती से लगभग 45 मिनट तक बातचीत हुई उनकी यह मुलाकात साधारण या रोज़ होने वाली मुलाकातों में से नहीं है क्योंकि 1995 में हुए बहुचर्चित ‘गेस्ट हाउस कांड ‘ के बाद दोनों दलों के नेताओं की कोई मुलाक़ात नही हुई। 23 साल बाद सपा और बसपा के बीच मोदी की वजह से ही सही संबंध अच्छे हुए है, वो बात अलग है राजनीतिक माहौल के साथ संबंध भी बदल जाते है।

फ़िलहाल के लिए बुआ भतीजा उत्तर प्रदेश और 2019 में देश में मोदी के समीकरणों को बिगाड़ने के लिए अपने झगड़े कुछ दिनों तक भूलने के लिए तैयार है। जिस तरह से सिर्फ दो लोकसभा सीटों ओर गठबंधन कर जीत का जश्न मनाया जा रहा है देख कर रही लगता है की इससे आगे भी गठबंधन की बहुत से गुंजाइशें दोनों ढूंढ रहे है।

भविष्य के लिए संकेत

  • इन नतीजो ने मोदी विरोधियों को एक उम्मीद की किरण दिखाई है, उनमें एक नई ऊर्जा आई है छोटे स्तर पर गठबंधन के प्रैक्टिकल के बाद राष्ट्रीय स्तर पर भी गठबंधन के रास्ते खोजना आसान हो जाएगा फिलहाल अभी तक महागठबंधन की कोई खोज खबर सुनने या देखने को नहीं मिली है।
  • मोदी मैजिक का दी एंड होना यहां से शुरू ही गया है ऐसा कुछ लोगो का मानना है। इसी के साथ भाजपा को अब यह सोचना होगा कि सभी चुनाव मोदी के नाम पर नहीं लड़े जा सकते, स्थानीय मुद्दे और समीकरण भी मायने रखते है और राज्य सरकार के कार्यो का प्रभाव भी चुनावो में पड़ता है।
  • विरोधी दलों के साथ आने का चलन बिहार में नीतीश और लालू ने साथ आकर आरम्भ किया था जिसको मायावती और अखिलेश आगे बढ़ा रहे है परिणाम बिहार जैसे होंगे या अलग ये अभी तय करना मुश्किल है क्योंकि ये दोनों पार्टियों की सहनशीलता पर निर्भर करता है कि वह कितना एक दूसरे को सहन कर सके बिहार में यह सहनशीलता बहुत कम थी इसलिए एक साल में ही दोनों ने एक दूसरे को अलविदा कह दिया। मोदी को सत्ता से हटाने के लिए कुछ समय तक सभी विरोधी दल साथ चलने के लिए मूड बना सकते है लेकिन  उनके लिए सीटों के बंटवारे और मुद्दों को लेकर परेशानियां अभी आनी बाकी है।
  • योगी आदित्यनाथ भाजपा के लिए कई राज्यों में स्टार प्रचारक रहे है लेकिन आने ही राज्य में महत्वपूर्ण सीट बचाने में नाकाम रहे। राज्य के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी नाक तले गोरखपुर का समीकरण बदल गया विरोधियों ने बड़ी समझदारी से उनके वोटर को ऊनी और खींच लिया। बसपा ने आसानी से आने दलित वोट सपा को ट्रांसफर कर दिए और सपा ने पिछड़ो और मुस्लिमों को गोलबंद कर लिया और ऐसे योगी की सीट उनके हाथ से निकल गई।
  • भाजपा कई समय से धर्म और गाय की राजनीति पर ध्यान लगाएं है लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति जातिय समीकरणों पर आधारित रहती है उत्तर प्रदेश में सपा ने जातीय समीकरण का मज़बूत आधार तैयार किया जो भाजपा पर भारी पड़ा।

उत्तर प्रदेश और बिहार में भाजपा भले भाजपा हार गई हों लेकिन सिर्फ दो या तीन सीटों से 2019 में हार या जीत का अनुमान लगाम गलत होगा भाजपा अभी  भी अन्य संगठनों से मजबूत है और  अभी तक  भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए अपने पत्ते नही खोले है मतलब बहुत कुछ होना अभी बाकी है।

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