क्या वाजपेयी की तरह, मोदी का किला भेद पायेंगी सोनिया ?

2014 से जिसका इंतज़ार हो रहा है वो 2019 आने वाला है  2014 में लोकसभा चुनाव के परिणाम आते ही सारी विपक्षी पार्टियां नरेंद्र मोदी की नीतियों की सच्चाई देखने के लिए अगले लोकसभा चुनावों इंतज़ार करने लगी थी। अब उनके लिए वो समय आ गया है जब वह बहुत कुछ खोया हुआ वापस पा सकती है।

2014 का चुनाव गंभीर आरोपो, समीकरणों के बनने बिगड़ने, सांगठनिक नीतियों के धराशाही होने होने का चुनाव था और इस बार ये मीटर और ऊपर जाने की पूरी पूरी संभावना है, छोटे राजनीतिक दल जो या तो मोदी विरोधी है या सत्ता में किसी तरह फिट होना चाहते है वो  गठबंधन में अपनी जगह ढूंढने में जुट गए है जिसकी मुखिया हमेशा की तरह कांग्रेस ही है।

2019 की आहट सोनिया गांधी द्वारा मंगलवार को अपने आवास 10 जनपथ पर 17 विपक्षी पार्टियों के प्रतिनिधियों को डिनर पार्टी देने से हुई ।यह डिनर पार्टी स्वाभाविक ही चर्चा का विषय बनना तय है यह बिल्कुल साफ है कि यह डिनर पार्टी लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष की सभी पार्टियों में एकजुटता लाने, सहयोग व समन्वय की भावना मजबूत करने की कोशिश है विपक्षी पार्टियों ने गठबंधन की संभावनाएं तराशने के लिए इखट्टा होने की पहल कर दी है।

सोनिया गांधी की भूमिका

सोनिया गांधी ने भले ही कांग्रेस अध्यक्ष की कमान छोड़ दी हो पर वह यूपीए की चेयरमैन और संसदीय दल की सदस्य भी है। कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद यह पहला मौका है जब सोनिया की तरफ से एक बड़ी राजनीतिक पहल ई गई।  सोनिया गांधी ने पहले भी यह बात साफ कर दी थी कि अभी उनका राजनीति से संन्यास लेने का कोई इरादा नहीं है ऐसे में राहुल जहाँ तक है कांगेस के अंदरूनी मामलों , संगठन को मजबूत करने पर अधिक ध्यान देंगे व सोनिया उनके प्रधानमंत्री बनने के लिए रास्ते गठबंधन में ढूंढेंगी।

सोनिया ने हाल ही दिए अपने इंटरव्यू में कहा था कि वह राहुल को सलाह देती रहेंगी और राजनीति में उनकी पूरी मदद करेंगी, यह भी सच है कि राहुल कहीं न कहीं सभी विपक्षी दलों को एक साथ लाने में असमर्थ नज़र आते है ऐसे में सोनिया पहले की तरह यूपीए की चैयरपर्सन के तौर पर उनके लिए गठबंधन की राह तैयार कर राहुल को चलने के लिए कहेंगी।

गठबंधन की गुंजाइश और तीसरा मोर्चा

इस दावत में शामिल होने को लेकर कई विपक्षी दलों में असमंजस से रहा कुछ ने इसमें शामिल हुए व कुछ ने दूरी बनाकर परिस्थितियों को भांपने की कोशिश कर रहे है। कांग्रेस ने जिस तरह आगे आकर गठबंधन की शुरुआत की है, यही समझ में आ रहा है कि बीजेपी विरोधी राजनीति के केंद्र कांग्रेस को स्थापित करने की कोशिश है।

इसी के समानांतर एक गैर बीजेपी गैर कांग्रेसी मोर्चा बनाने की कोशिश भी चल रही है इसलिए कुछ क्षेत्रीय पार्टियां स्वयं को किसी भी गठबंधन से दूर रखें हुए है कुछ स्थानीय संगठन स्थानीय स्तर पर कांग्रेस को अपना प्रतिद्वंद्वी मानते है उनको यह डर है कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस से नज़दीकी उन्हें अपने वोटर्स की नज़र में संदिग्ध न बना दे।

कुछ संगठनों का मानना है कि अपने स्तर पर वोटर्स को लुभाने वाला काम बीजेपी या कांग्रेस से दूरी बनाते हुए तीसरे मोर्चे से भी हो सकता है। बीजेपी ,कांग्रेस का विरोध करने की जिम्मेदारी इस तीसरे मोर्चे के बैनर तले अपने अपने इलाको में खुद ये दल ही क्यों न करें। इससे बीजेपी और कांग्रेस दोनों के मजबूत होने की संभावना कम हो जाएगी।

तीसरे मोर्चे की कवायत ज़ोर पकड़ने का कारण है कांग्रेस का कमजोर होने और उसको कमजोर रखने के लिए ही यह कोशिश की जा रही है।

भविष्य में संभावना

गठबंधन धीरे धीरे परवान चढ़ेगा लेकिन सब कुछ इन राजनीतिक संगठनों के हाथ मे ही नहीं है इस पर  अंतिम फैसला जनता को ही लेना है लोगो के मुद्दे , आकांक्षाएं इस गठबंधन में कहां तक जगह बना पाती है यह भी इसकी सफलता निर्धारित करेग।

इसलिए गठबंधन की मुखिया कांग्रेस को चाहिए कि गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए जन आंदोलनों की तासीर को भी समझे। गठबंधन धर्म के ज़रिए अपना गढ़ बचाने की मशक्कत कांग्रेस कर रही है मतलब कांग्रेस का भविष्य कहीं न कहीं इस पर निर्भर रहता है कि वह गठबंधन को कितना सफल बना पाती है।

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