उसे इच्छामृत्यु की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी

आमतौर पर सभी व्यक्त्ति जीवन जीने के लिये संघर्ष करते है लेकिन इस भाग दौड़ भरी जिंदगी में कोई ऐसा भी है जो मरने के लिए संघर्ष करता है, सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु पर दिए अपने फैसले में ऐसे ही लोगो को गरिमा के साथ मरने का मौलिक अधिकार दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हर व्यक्ति को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार है इसमें मौत भी शामिल है।

हंसता हुआ जो जाएगा

जस्टिस दीपक मिश्रा वाली बेंच ने एक मत से फैसला दिया, जस्टिस एके सीकरी ने कहा कि दुनिया मे हर व्यक्ति स्वस्थ व प्रसन्न जीवन जीना चाहता है और मरने के वक़्त भी कोई पीड़ा नहीं चाहता एक हिंदी फ़िल्म के गाने को कोट किया ” रोते हुए आते हैं सब, हस्ता  हुआ जो जाएगा। वो मुक़द्दर का सिकंदर जानेमन कहलायेगा।

“हर व्यक्ति को स्वायत्तता होने चाहिए कि आखरी समय मे उसका इलाज किस तरह हो , जिस व्यक्ति की मृत्यु नज़दीक हो उसे इलाज से मना करने का अधिकार होना चाहिए, जीवन का अधिकार मरते दम तक रहता है।

क्या है Euthanasia?

जब कोई मरीज ऐसी बीमारी से गुज़र रहा हो जिसका कोई इलाज न हों ,वह हर दिन बेहद दर्दनाक पीड़ा को झेलता हो, जिसमें हर दिन मौत के समान लगे तो उन मामलों में कुछ देशों में इच्छामृत्यु दी जाती है। जिसमें बेल्जियम, नीदरलैंड, लुग्ज़मबर्ग,स्विट्जरलैंड शामिल है।

कितनी तरह की इच्छामृत्यु

  • Active Euthanasia :- इसमें डॉक्टर मरीज़ को ऐसा इंजेक्शन लगाता है जिससे उसकी कार्डिएक अरेस्ट के कारण मौत  हो जाती है
  • Passive Euthanasia :-  इसमें डॉक्टर मरीज का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटा देते है जिसे उसके जीने की उम्मीद खत्म हो जाती है।
  • Physician assisted Sucide:-  इसमें मरीज खुद जहरीली दवाई खा लेते है जिससे उनकी मौत हो जाती है।

फैसले के पीछे का संघर्ष

भारत मे इच्छामृत्यु की मांग सालो से होती रही है मगर अभी तक किसी को नही मिल सकी। इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण अरुणा शानबाग है अरुणा की कहानी किसी की भी आंखे नाम कर सकती है। अरुणा ने कोमा में जाने के बाद 42 साल बिस्तर पर पड़े पड़े गुज़ार दिए मगर इच्छामृत्यु न मिल सकी।

42 साल तक मुर्दो जैसी ज़िन्दगी बिताने वाली अरुणा की दर्द भरी दास्तां शब्दों में बयान नहीं हो की जा सकती, 2011 में उनके लिए इच्छामृत्यु की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दिया था और 2015 में निमोनिया के कारण उनकी मौत हो गई।

कौन थी अरुणा

अरुणा कौन थी जिसे इच्छामृत्यु की सबसे ज़्यादा जरूरत थी 42 साल पहले एक हादसे ने हंसती खेलती ज़िन्दगी को मौत में बदल दिया केईएम अस्पताल का कोई भी व्यक्ति उस दिन को याद करना नहीं चाहता जिसने अरुण की ज़िंदगी काली कर डाली।  23 साल की अरुणा शानबाग मुम्बई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में ट्रेनी नर्स के तौर पर डॉग रिसर्च लैबोरेटरी में काम करती थी वही सोहनलाल नाम का एक वार्ड बॉय कुत्तो के लिए आने वाले मीट की चोरी करता था। अरुणा के ऐसा करने को मना करने पर दोनों की कहासुनी हुई जिसकी शिकायत अरुणा ने अस्पताल प्रशासन से की।

27 नवंबर 1973 को ड्यूटी पूरी कर के अरुणा जब कपडे बदलने के लिए चेंजिंग रूम गई तब सोहनलाल पहले से ही घात लगाए बैठा था उसने कुत्ते बांधने वाले पट्टे से अरुणा का गला दबाने की कोशिश की छूटने के लिए अरुणा ने खूब ताक़त लगाई, उसके साथ यौन शोषण रने की भी कोशिश की गई पर उसको बेहोश समझकर सोहनलाल वहाँ से भाग गया ,पर चैन कसाब से दिमाग तक खून पहुचाने वाली नस फट गई। आंखों की रोशनी चली गई, शरीर को लखवा मार गया, अरुणा बोल भी नहीं पा रही थी। अगले दिन स्टाफ को अरुणा बुरी हालत में मिली लेकिन तब तक वह कोमा में जा चुकी थी।

परिवार को  छोर, अस्पताल में बीते 42 साल

एक इंसान की हैवानियत और उसकी दरिंदगी की शिकार अरुणा के परिवार ने भी वक़्त बीतने के साथ उससे मुंह मोड़ लिया 42 सालो में परिवार का कोई व्यक्ति मिलने नही आया।  बिस्तर पर ही ड्रिप के ज़रिए खाते पीते नित्य क्रियाएं करते इतने साल बीत गए की इच्छामृत्यु के सहारे ही जीवन को पार लगाने का एक रास्ता नज़र आता था।

केएम अस्पताल की नर्सो ने चार दशकों तक अरुणा की जान से सेवा की उनका खयाल रखा। उनके देहांत के बाद केएम अस्पताल ने उनकी याद में कमरा नंबर चार को अरुणा शानबाग का नाम दिया गया , इसी कमरे में दुष्कर्म पीड़ित अरुणा 42 डाल तक कोमा में रहीं।

आरोपी सोहन को सज़ा

अरुणा के कोमा में जाने के कुछ बाद ही पुलिस ने सोहन को पकड़ लिया, उस पर हत्या की कोशिश और कानों की बाली लूटने का आरोप लगा लेकिन बलात्कार की कोशिश की उसपर कोई धारा नही लगाई गई फिर भी सोहन को सात साल की सज़ा सुनाई गई, सोहन को गांव और नौकरी से भी निकाल दिया गया, सात साल बाद वह जेल से आज़ाद हो गया लेकिन अरुणा बेसुध ही रही ।

इच्छामृत्यु के लिए गुहार

  • उनकी ऐसी हालत देखते हुए केएम अस्पताल की पूर्व नर्स पिंकी वीरानी ने 2011 में उच्चतम न्यायालय में उनके लिए इच्छामृत्यु की मांग करते हुयर याचिका दायर की,  लेकिन वह खारिज हो गई.
  • 18 मई 2015 को सुबह अरुणा की मौत हो गई डॉक्टरों के मुताबिक उनकी मृत्यु निमोनिया से हुई लेकिन मौत 42 साल पहले रेप के वक़्त ही हो गई थी.
  • उस बंद कमरे में अरुणा जीवन और मृत्यु के बीच चीख़ पुकार करती रही लेकिन कोई उसे सुन नहीं सका इच्छामृत्यु की सबसे ज़्यादा दरकार अरुणा को थी लेकिन जीवन की तरह मौत भी अरुणा के हाथ मे नहीं थी.

क्यों नहीं दी इच्छामृत्यु?

2011में पिंकी वीरानी ने सुप्रीम कोर्ट से अरुणा के लिए इच्छामृत्यु की मांग की, पिंकी वीरानी ने अरुणा की जीवनी भी लिखी है. उसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अपील की थी  की अरुणा की स्थिति को देखते हुए उन्हें मरने की अनुमति दे जानी चाहिए जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जीवन समाप्त करने का फ़ैसला माता पिता, पति पत्नी या अन्य करीबी रिश्तेदार या बेहद करीबी मित्र के द्वारा लिया जाना चाहिए। कोर्ट ने वीरानी को अरुणा के सबसे करीबी दोस्त के रूप में मानने से इंकार  कर दिया कोर्ट ने केएम अस्पताल के कर्मचारियों को सबसे करीब दोस्त माना क्योंकि वही उनकी देखभाल कर रहे थे उन्होंने चाहा की अरुणा उनकी निगरानी में रहे जिसकी कोर्ट ने इजाजत दी।

इसके अलावा डॉक्टरों की रिपोर्ट के आधार पर भी उनको इच्छामृत्यु नही दी गई ,वह पूरी तरह कोमा में न हिट हुई दवाई, भोजन ले रही थी। बेंच ने कहा – यदि हम किसी भी मरीज से लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटा लेने का हक़ उनके रिश्तेदारों या दोस्तो को दे देंगे, तो इस देश मे हमेशा यह जोखिम रहेगा की इस हक़ का गलत इस्तेमाल हो जाए मरीज की पप्रोपर्टी हथियाने के मकसद से लोग ऐसा कर सकते है।

अरुणा 2015 में इस दुनिया को छोड़कर चली गई  लेकिन इस बहस को छोड़ गई थी कि इच्छामृत्यु दी जानी चाहिए या नहीं। तीन साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसपर फैसला लेकर इससे जुड़े कई अहम मुद्दों को विराम तक पहुचाया है।

अरुणा के जैसे जिन लोगो का जीवन संघर्ष के सभी पैमानों से मिलो आगे आ चुका है उनके लिए मरने के अधिकार की बात बोलकर सुप्रीम कोर्ट ने जीवन के साथ साथ गरिमा व शांति से मरने को भी अधिकारों में लाकर मानवीय जीवन को बेहतर स्तर लाने का प्रयास किया है।

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