नज़रिया – महिला दिवस मनाया जाना, फख्र नहीं शर्म की बात

मर्द का नज़रिया… कब बदलेगा? आखिर क्या हैं महिला दिवस पर एक मर्द की राय.. ये सवाल हम-आप सभी ने साल में एक बार आने वाले महिला दिवस पर कई बार सुना होगा। सबके पास इसका बड़ा ही खूबसूरत जवाब भी हैं, कि मैं महिलाओं का सम्मान करता हूँ. बीवी के साथ खाना बनवाने में उसकी मदद करता हूँ. महिलाओं को किसी एक खास दिन पर स्पेशल फील कराता हूँ साथ ही साथ उनकी दी गई कुर्बानियों को याद करता हूँ।

ऐसे कई जवाब हैं जो आपने अक्सर सुने होंगे. अब मैं आप सभी से सिर्फ इतना पूछना चाहता हूँ कि क्या हम सब सिर्फ इसी बदलाव के लिए महिला दिवस या उनके सशक्तिकरण कि बात करते हैं ? आखिर क्यों महिलाओ को सम्मान दिए जाने कि बात कि जाती हैं। हमेशा क्यों हर बार और बार-बार ये एहसास कराया जाता हैं कि आपको दिया गया सम्मान पुरुष जाती का महिलाओं के प्रति किया गया मात्र एक छोटा सा एहसान हैं।

पत्नी के साथ हर वक़्त खड़े रहने कि कसमों के बाद भी अगर किसी दिन साथ में खाना बना दिया गया तो फिर ये समझना कि आपने आज एक महिला कि मदद करके बहुत बड़ा काम कर लिया। उसको एक दिन या कभी कभी स्पेशल फील कराके आप अपने बाकी के दिन बेहतर बनाने कि कोशिश को सम्मान या मोहब्बत कहते हैं। उनकी दी गई कुर्बानियों को याद करके उनपर रहम दिखाना क्या यही महिला दिवस का मुख्य मक़सद हैं ? सवाल तो बहुत हैं पर सबसे बुनियादी सवाल हैं कि आखिर क्यों महिलाओं को सम्मान मिलने कि बजाय दिया जाता हैं?

हम आज कितना भी खुद को प्रोग्रेसिव सोच वाला दिखाने कि कोशिश करे पर कही ना कही हमें खुद को बड़े होने का गुरुर होता हैं और इसमें हमारी गलती भी नहीं हैं ये सोच पीढ़ियों दर पीढ़ी से चलकर हमारे अंदर आई हैं। आप खुद ही देख लीजिये पहले हम माँ का दूध पीते है उसके बाद फिर किसी और कि माँ को बड़ी बेशर्मी से गाली भी दे देते हैं और फिर कहते हैं हम सब महिलाओं का सम्मान करने लगे हैं।

दरअसल महिला दिवस का मनाया जाना इस समाज के लिए फक्र कि नहीं बड़े शर्म की बात हैं, हमारे समाज में इतना खोखलापन हैं कि नारी को अपनी बात रखने और असमानता को ख़त्म करने लिए एक खास दिन बनाने कि ज़रूरत पड़ गई और हम नासमझी में इसे होली, दिवाली कि तरह त्यौहार समझ के मनाने में लगे हैं।

फैंसी ड्रेस कम्पीटीशन… पार्टी थीम.. फूलों और बधाइयों के आदान प्रदान करने में इतना व्यस्त हो गए कि इस दिन का असली मक़सद और मतलब ही भूलते चले गए और ना चाहते हुए भी राजनीती का शिकार बन गए।

मैं ज़्यादा नहीं कहना चाहता सिर्फ इतना यकीन दिलाना चाहता हूँ कि यकीनन हमारी समझ बदल रही हैं…लेकिन हमें खुद को बदलने में वक़्त लगेगा और ये बदलाव सिर्फ महिलाये ही आसानी से ला सकती हैं. क्योंकि एक माँ से बेहतर गुरु आज तक कोई नहीं हुआ हैं और अगर हर माँ इसी कोशिश में लग जाए तो आने वाला वक़्त बहुत ही खूबसूरत होगा. ना दिखावे कि ज़रूरत होगी और ना ही किसी दिवस कि हर दिन सिर्फ खूबसूरत ज़िन्दगी का और सिर्फ हमारा-आपका होगा।

सबसे आखिर में आपको एक बात बड़ी अच्छी तरीके से समझनी होंगी कि इस समाज में बदलाव आप सड़को पे नारे और पुरुषों को कोस कर नहीं ला सकती.. क्योंकि इसमें आप उसी राजनीति का शिकार हो जाती हैं जो कभी नहीं चाहता कि उसका मुद्दा ख़त्म हो. लेकिन आप एक माँ, बहन, बीवी या बेटी बनकर वो कर सकती हैं जिसकी उम्मीद आज पूरे समाज को है. और हां आखिर में ‘हम बदल रहे हैं. हमारी सोच बदल रही हैं’ बस थोड़ा वक़्त और आपके साथ कि ज़रूरत हैं।

यह लेख टीवी पत्रकार प्रशान्त तिवारी की फ़ेसबुक वाल से लिया गया है

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