श्री श्री रविशंकर के मुंह से ऐसे बयान की उम्मीद नहीं थी

वैसे हमारे देश मे धार्मिक भावनायें भड़काने और नासमझी वाला बयान देने वाला कार्य नोसिखिया नेताओं का ही होता है लेकिन अब यह काम धार्मिक गुरु भी करने लगे है आदर्श के तौर पर देखा जाए तो किसी भी धार्मिक गुरु को संबंधित धर्म के विषय मे ज्ञान देने के अलावा राष्ट्र में सभी धर्मों के बीच सौहार्द बनाने का कार्य व धार्मिक करना चाहिए और किसी भी प्रकार के राजनीतिक व धार्मिक मतभेदो में कूदने की चेष्ठा नहीं करनी चाहिए और उन्हें सुलझाने की तो बिल्कुल नहीं।

ताजा मामला श्री श्री रविशंकर का है जिन्होंने कुछ ही समय पहले फैसला लिया था कि वह अयोध्या राम जन्म भूमि विवाद को अदालत से बाहर ही संबंधित पक्षो से बातचीत करके सुलझाने की कोशिश करेंगे इसी सिलसिले में उन्होंने प्रयास शुरू किये लेकिन उन्हें इस मामले में तूल नहीं मिला। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के चैयरमेन ने इस विषय पर कहा कि वह अदालत के फैसले को ही अंतिम फैसला मानेंगे और अनौपचारिक तौर पर विवाद से संबंधित बातचीत करने के पक्ष में वह नहीं हैं।

फिर भी श्री श्री प्रयास करते रहे हाल ही में विवाद पर मीडिया से बातचीत में वह कहते है कि यदि अयोध्या विवाद नहीं सुलझा तो देश सीरिया में बदल जाएगा इस देश के भविष्य को संघर्ष को अपना अस्तित्व समझने वालों के हवाले न करें।

समझ मे नहीं आता रविशंकर किस पक्ष से है व उनकी ये पंक्तियां किसके लिए थी,यदि श्री श्री वास्तव में एक मध्यस्थ के रूप में विवाद सुलझाने पहुंचे है तो साधारणतः यह हिन्दू कट्टरपंथीयों के लिए थी, यदि वह स्वयं को एक हिन्दू मानकर या सरकार का दूत बनकर गए हैं तो पंक्तियां मुस्लिमों के लिए थी। समय के साथ साथ उनकी इस विवाद में भूमिका भी साफ होने लगेगी।

फिलहाल के लिए उन्होंने अपने बयान में कहा कि ” मुझे पूरा विश्वास है कि राम मंदिर मसला शीघ्र सुलझा लिया जाएगा, इसके लिए वह देश के कोने कोने में जाकर दोनों संबंधित समुदायों के बीच सौहार्द स्थापित करने के प्रयास जारी रखेंगे, सब कुछ सही दिशा में चल रहा है।

उन्होंने कहा:- ” मैं दोनों पक्षो के बीच समझौते के प्रयास में लगा हूँ सुलह- समझौते की कोशिशों को पूरे देश से समर्थन मिल था है सभी पक्षो से बातचीत का क्रम बरकरार रखते हुए प्रयास आगे भी जारी रहेगा, उम्मीद है अयोध्या में मंदिर बनाने का रास्ता जल्द से जल्द खुल जायेगा।

इसके अलावा कुछ समय पहले श्री श्री ने प्रदेश सरकार के संस्कृति ,धार्मिक कार्य, अल्पसंख्यक एवं वक्फ मामलों के मंत्री लक्ष्मी नारायण के साथ उन्होंने आधे घंटे तक मुलाकात की जो राम मंदिर निर्माण में सभी बाधाओं को दूर करने केंद्रित थी।

श्री श्री रविशंकर स्वयं को इस विवाद के मध्यस्थ के तौर पर पेश करने का प्रयास कर रहे है लेकिन उनके कुछ वक्तव्य इस बात से अब मेल नहीं खा रहे ‘उन्होंने कहा कि अयोध्या मुस्लिमों का धार्मिक स्थल नहीं है व मुस्लिम वहाँ से अपना दांवा छोड़कर देश कर सामने एक मिसाल कायम करें’।

उनका मानना है कि अदालत के फैसले पर कोई पक्ष राज़ी नही होगा व कुछ समय शांत रहने के बाद दंगा फसाद शुरू हो सकता है। शांति के दूत श्री श्री को यह भी मानना होगा जितना भयंकर परिणाम वह सोच रहे है भारतीय जनता इससे कुछ हद तक दूर हो चुकी है और मुस्लिम संगठनों के अदालत के निर्णय को ही अंतिम निर्णय स्वीकारने के फैसले के बाद हिंसा की गुंजाइश कम रह जाती है यदि श्री श्री जैसे लोग भड़काने वाले बयानों से थोड़ी दूरी बनाए रखे तो।

यह बात अभी सोचने की है कि रविशंकर की अयोध्या से दूरी बनाने की नसीहत वाली कृपा मुस्लिमो पर ही क्यों हुई , वास्तव मे कहीं न कहीं उनके भीतर भी हिन्दू धर्म के प्रति मोह की चिंगरी जल रही है जो उन्हें अयोध्या तक खींच लाई वास्तविकता वह भी जानते है की कोर्ट के बाहर लिए गए निर्णयों की गारंटी और प्रासंगिकता कितनी होती है। भारत में ग्रह युद्ध की उनकी आशंका शायद आशंका न होकर एक योजना हो, उनकी नहीं तो किसी और कि।

वरना ऐसा बयान शांति दूत के मुख से सुनने की उम्मीद कम ही लोगो को थी। भारत मे सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की स्वीकार्यता पर कोई प्रश्न चिह्न नहीं है चाहे निर्णय जिसके भी पक्ष में हो, विवाद से संबंधित तीनो पक्ष भी कोर्ट को ही सर्वोच्च मानते है । ऐसे में निर्णय के समय पक्षो को इतने सालों में अपनी धार्मिक परिपक्वता की परीक्षा देनी होगी । और तब तक के लिए श्री श्री रविशंकर जैसे लोगों को ऐसे बयानों व ऐसे विवादों, दोनों से दूरी बनाए रखनी चाहिए।

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