क्या आप भारत की पहली महिला डॉक्टर को जानते हैं ?

वर्तमान भारत मे महिलाएं पुरुषों के का कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है, ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहाँ महिलाओं ने सफलता के झंडे न लहराए हो। महिलाओं के प्रति समाज की संकुचित सोच आज परास्त होने की कगार पर आ चुकी है इसका कारण वो महिलाएं रही है जिन्होंने इन सामाजिक जंज़ीरों को तोड़ने की शुरुआत की थी उन्हीं की बदौलत आज की पीढ़ी को यह साहस मिल पाया कि हर आलोचना को नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ सके। कादंबिनी गांगुली उन्हीं महिलाओं में से एक है जिन्होंने भारतीय समाज मे महिलओं के प्रति रुढ़िवादी सोच को तोड़ने का साहसिक प्रयास किया।

भारत की पहली महिला ग्रेजुएट:-

यह उस समय की बात है जब ब्रिटिश हुकूमत को भारत पर राज करते हुए 100 वर्ष से अधिक हो गए थे ,देश मे स्वतंत्रता को लेकर विचार चिंगारी के भांति जल रहा था। औरतें घर, बच्चे संभालने से आगे सोच भी नहीं सकती थी, तब बिहार के भागलपुर की एक लडक़ी मेडिकल साइंस की तीन एडवांस डिग्री लेकर भारत के इतिहास में महिलाओं के लिए एक प्रेरणा बनने जा रही थी।

कादंबिनी गांगुली देश की पहली महिला ग्रेजुएट थी व 1878 म3 कलकत्ता यूनिवर्सिटी का एंट्रेंस एग्जाम पास करने वाली भी पहली महिला कादंबिनी थी। वह पहली दक्षिण एशियाई महिला थी जिन्होंने यूरोपियन मेडिसिन में प्रशिक्षण लिया।

1886 में कादंबिनी से पहले आनंदीबेन जोशी अमेरिका के पेंसिलवानिया जाकर डॉक्टर बन चुकी थी परंतु डिग्री लेने के छह महीने बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। इससे कादंबिनी डिग्री लेने वाली पहली महिला ना बन आए मगर वो पहली प्रैक्टिसनर भारत की  पहली वर्किंग मदर रही हैं और  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में भाषण देने वाली पहली महिला भी वही है।

व्यक्तिगत जीवन:-

कादंबिनी ब्रम्ह समाज को मानती थी उन्होंने 21 साल की उम्र में 39 साल के विधुर द्वारिका नाथ गांगुली के साथ विवाह किया , पांच सौतेले बच्चो के साथ साथ अपने तीन बच्चो को भी संभाला वह अपने दांपत्य जीवन से खुश थी। जब वह यूरोप से मेडिकल साइंस की पढ़ाई कर रहीं थी उस समय दो बच्चो की माँ बन चुकी थी। कादंबिनी बंकिमचंद्र चटोपाध्याय की रचनाओं बेहद प्रभावित थी।

1906 ई. की कलकत्ता कांग्रेस के अवसर पर आयोजित महिला सम्मेलन के अध्यक्षता उन्होंने ही की थी,  1914 में जब महात्मा गांधी जब कलकत्ता  आये तब उनके सम्मान में आयोजित सभा के अध्यक्षता भी उन्होंने ही की। 3 अक्टूबर 1923 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।

मशहूर फ्लोरेंस नाइटेंगल इस बात से बहुत आश्चर्यजनक थी। जिस दौर में औरतें घुंघट से बाहर नहीं निकलती थी और दौर में कादंबिनी का शादीशुदा होकर विदेश करने जाना वो भी तब जब उनके पास पहले से कॉलेज की दो डिग्रीयां थी, भारतीय समाज मे आलोचनाओं का कारण बना उस समय “भले घर” की लड़कियां स्कूल कॉलेज जाकर नहीं पढ़ा करती थी।

पहली वर्किंग वुमेन:

रूढ़िवादी सोच धारकों द्वारा कादंबिनी खूब आलोचना की गई कुछ पत्रिकाओं ने उनको वैश्य तक करार देते हुए लेख छापे, कादंबिनी ने कईयों पर केस किया व जीत भी।2023 में कादंबिनी की मृत्यु को सौ वर्ष हो जाएंगे इन सौ वर्षों में महिलाओं को लेकर जितने भी बदलाव आए है सब हमारे सामने है इन सौ वर्षों में कामकाजी महिलाओं को लेकर सोच पूरी तरह बदल चुकी है। वह न होती तो शायद हमारा समाज और देर से जागता।

कादंबिनी अपने समय की न सिर्फ महिलाओं में बल्कि पुरुषों में भी सबसे अधिक पढ़ी लिखी महिला थी। उन्होंने वर्किंग वुमन, एक माँ, डॉक्टर, सोशल एक्टिविस्ट का रोल एक साथ निभाया जो कोई आसान कार्य नहीं था। उनका जीवन आम महिलाओं की बुझी हुई निराशाओं में जान फूंकने का काम करता है  महिला शिक्षा की शुरुआत करने, समाज की धारणाओं को तोड़ने का, कादंबिनी एक बेहद अच्छा उदाहरण है जिन्होंने वर्तमान भारत की महिलाओं के लिए सामाजिक उदारवाद की राह तैयार की।

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