क्या दिल्ली पुलिस का सियासी इस्तेमाल किया जा रहा है ?

2 साल 4 महीने 9 दिन में नजीब की खबर न कर पाने वाली दिल्ली पुलिस, सीएम केजरीवाल के घर का रंग तक जानने के लिए 2 दिन में पहुंच गयी, यही लोकतंत्र है? आजाद भारत की राजनीति में जो बदलाव या अजूबापन पिछले दो-चार सालों से देखने को मिल रहा है, वह पहले कभी देखने को नहीं मिला, जिसमें ऐसे-ऐसे कारनामें देखने को मिले हैं, जिन पर यदि विचार किया जाए तो कितना हास्यपद है, कुछ कहा या बताया नहीं जा सकता, लेकिन मजे की बात यह है कि इन अजीबो-गरीब घटती घटनाओं को लेकर भारत के नागरिक भी बहुत मजे में टीवी चैनलों को खोलकर रात के डीनर के साथ, मजे लेकर देखने में आनन्दित होते हैं।

उन्हें यह ख्याल तक नहीं कि यह जो कुछ भी हो रहा है, उसका अप्रत्यक्ष असर उनके अपने जीवन पर भी पड़ रहा है, और यदि आज नहीं पड़ रहा तो आने वाले कल में जरूर पड़ेगा। लेकिन क्या किया जा सकता है, यही तो भारत की महानता है, शायद इसीलिए भारत को महान कहा जाता है।

14 अक्टूबर 2016 की रात से गायब है नजीब, कोई सुराग नहीं

2 साल चार महीने और 10 दिन होने को आये लेकिन, देश की राजनीति की हाईटैक कही जाने वाली दिल्ली पुलिस उस जरा से आम से एक स्टूडेंट का कोई सुराग आज तक नहीं लगा पाई, आपको यह जानकर आश्चर्य हो भी सकता है और नहीं भी, क्योंकि खबरों के दौर में आपके लिए यह भी एक खबर ही थी, और होगी, लेकिन एक माँ अपने बेटे की आशा में आज भी बैठी है, एक बहन और भाई और कई दोस्त की शायद एक दिन अचानक नजीब वापस आ जाएगा।

हाँ वही नजीब जो दो साल पहले न्यूज चैनलों और अखबारों की दुनिया के लिए जरूरी बन गया था, टीआईपी का सवाल जो था, सवाल नजीब के मिल जाने का अगर होता तो आज भी प्रति दिन आपके टीवी पर नजीब दिखाई पड़ता, उसकी रोती बिलखती माँ और परिवार दिखाई पड़ता।

पर खबर तो कुछ दिन ही ताजा रहती है, खबरों को फिर कोई नया नजीब चाहिए होता है, या उसी दिल्ली का अंकित सक्सेना जिसे बीच चौराहे पर गला रेत कर मार दिया जाता है, वह भी खबरों की दुनिया में बहुत चला दो-चार रोज।

दिल्ली पुलिस की तत्परता तब कहाँ चली जाती है अचानक?

लेकिन यह कहानियाँ इसलिए याद दिलानी पड़ी, क्योंकि न तो आज तक नजीब मिला, और न ही नजीब के साथ मारपीट करने वाले गुंडे गिरफ्तार किए गए। काश दिल्ली पुलिस नजीब की लाश ही ले आती, तो उस माँ के कलेजे को ठंडक पड़ जाती, जो हर दिन और हर रात जल रही है, इसी आस में कि मेरे बेटे का क्या हुआ? दूसरा न अंकित के हत्यारों को अब तक कोई सजा हुई।

क्या इन मामलों में दिल्ली पुलिस के अधिकारी और सिपाही छुट्टियों पर चले जाते हैं? क्या तब दिल्ली पुलिस इतनी हाईटैक नहीं रहती, जितनी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और ‘आम आदमी पार्टी’ मंत्री, नेताओं और कार्यकर्ताओं पर कार्यवाही के मामले में हो जाती है? और राज्यों या सरकारों के साथ ऐसा आज तक क्यों नहीं हुआ?

केजरीवाल के मंत्री पर फर्जी डिग्री का आरोप लगा गिरफ्तार करना हो, किसी मंत्री पर फर्जी मामलों में मानहानि करना, स्वयं सीएम पर मुकदमा दर्ज करना हो, राज्यसभा सांसद संजय सिंह के सदन में भ्रष्टाचार पर सवाल उठाने पर 5 हजार करोड़ की मानहानि का केस हो, मंत्री की डिग्री के लिए कई दिनों तक मंत्री को साथ लेकर दिल्ली पुलिस का साथ-साथ घूमना हो, सीबीआई को उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया और सीएम केजरीवाल के आॅफिर पर छापा मारना हो, पिछले तीन सालों के कार्यकाल में ऐसी ही न जाने कितनी घटनाएं हैं, जो भारत के किसी राज्य के किसी सीएम या उसके मंत्री के साथ देखने को नहीं मिलीं, यहाँ तक कि दिल्ली के राजनीतिक इतिहास में कभी दिल्ली सीएम के साथ ऐसा नहीं हुआ जब केजरीवाल से पहले और भी बहुत से सीएम हुए।

देश के कई सीएम और मंत्रियों पर बहुत ही अपराधिक मामले में केस दर्ज हुए, बहुतों पर अब भी दर्ज हैं, लेकिन जिस तरह से दिल्ली पुलिस लगातार एक चुनी हुई प्रचंड बहुमत की सरकार के साथ व्यवहार कर रही है, उससे यह स्पष्ट हो जाता है, कि दिल्ली की पुलिस क्या करना चाहती है, और कौन दिल्ली पुलिस से क्या कराना चाहता है। जग जाहिर है, दिल्ली पुलिस केन्द्र सरकार के अधीन है, और केन्द्र सरकार के अधीन आने वाले एक भी अधिकारी, राज्यपाल खुद केन्द्र के मंत्री दिल्ली सरकार के साथ कैसा रवैया अपनाये हुए हैं।

वही हुआ जो हमेशा होता आया आप सरकार के साथ दिल्ली पुलिस दल बल के साथ सीएम के आवास पर पहुंच गयी, छापा मारने, 2 घंटे लगभग सर्च अभियान चला, सीएम के घर का पेंट कब कराया गया, कितने कैमरें चल रहे हैं, कितने बंद पड़ें हैं, क्यों बंद पड़े हैं, बाथरूम कहाँ है, यह सब पूछा गया सीएम आवास पर दिल्ली पुलिस द्वारा, वो भी दिल्ली के एक अधिकारी द्वारा मारपीट के आरोप मात्र लगाने के ठीक दो दिन बाद ही, जिस मामले में मुख्य दो आरोपियों को जो कि आप के विधायक हैं, जेल भी भेजा जा चुका है।

तब यह खेल एकदम खुला है, हाँ आप अपनी टीवी पर इस खबर को देखकर और अखबार को पढ़कर आनंद लीजिए क्योंकि आप किसी पार्टी का विरोध करते-करते अपने और लोकतंत्र के विरोधी बन बैठे हैं।

अभिषेक शायर

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