निराला को प्रेरणा मानते थे, आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री

भारत भारती पुरस्कार से सम्मानित आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री उन थोड़े से कवियों में रहे हैं, जिन्हें हिंदी कविता के पाठकों से बहुत मान-सम्मान मिला है. उनका काव्य संसार बहुत ही विविध और व्यापक है.शुरूआती जीवन में उन्होंने संस्कृत में कविताएं लिखीं. फिर महाकवि निराला की प्रेरणा से हिंदी में लेखन प्रारंभ किया.आज उनके 102वाँ जन्मदिवस है.जानिए कैसा था आचार्य जी का जीवन..

जानकी वल्लभ शास्त्री का जन्म 5 फरवरी 1916 में बिहार के मैगरा गांव में हुआ था.इनके पिता स्व. रामानुग्रह शर्मा था.उन्हें पशुओं का पालन करना बहुत पसंद था. उनके यहां दर्जनों गायें, सांड, बछड़े तथा बिल्लियां और कुत्ते थे. पशुओं से उन्हें इतना प्रेम था कि गाय क्या, बछड़ों को भी बेचते नहीं थे और उनके मरने पर उन्हें अपने आवास के परिसर में दफ़न करते थे. उनका दाना-पानी जुटाने में उनका परेशान रहना स्वाभाविक था.

जानकी वल्लभ शास्त्री ने मात्र 11 वर्ष की उम्र में ही इन्होंने 1927 में बिहार-उड़ीसा की प्रथमा परीक्षा (सरकारी संस्कृत परीक्षा) प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की. शास्त्री की उपाधि 16 वर्ष की आयु में प्राप्तकर ये काशी हिन्दू विश्वविद्यालय चले गए. ये वहां 1932 से 1938 तक रहे. उनकी विधिवत् शिक्षा-दीक्षा तो संस्कृत में ही हुई थी, लेकिन अपनी मेहनत से उन्होंने अंग्रेज़ी और बांग्ला का भी ज्ञान प्राप्त किया. वह रवींद्रनाथ के गीत सुनते थे और उन्हें गाते भी थे.

बहुत छोटी उम्र में ही उनकी माता चल बसीं.आर्थिक समस्याओं से बाहर निकलने के इन्होंने बीच-बीच में नौकरी भी की. 1936 में लाहौर में अध्यापन कार्य किया और 1937-38 में रायगढ़ (तत्कालीन मध्य प्रदेश वर्तमान छत्तीसगढ़) में राजकवि भी रहे.1934-35 में इन्होंने साहित्याचार्य की उपाधि स्वर्णपदक के साथ अर्जित की और पूर्वबंग सारस्वत समाज ढाका के द्वारा साहित्यरत्न घोषित किए गए.

1940-41 में रायगढ़ छोड़कर मुजफ्फरपुर आने पर इन्होंने वेदांतशास्त्री और वेदांताचार्य की परीक्षाएं बिहार भर में प्रथम आकर पास की. 1944 से 1952 तक गवर्नमेंट संस्कृत कॉलेज में साहित्य-विभाग में प्राध्यापक, पुनः अध्यक्ष रहे. 1953 से 1978 तक बिहार विश्वविद्यालय के रामदयालु सिंह कॉलेज, मुजफ्फरपुर में हिन्दी के प्राध्यापक रहकर 1979-80 में अवकाश ग्रहण किया.

जानकी वल्लभ शास्त्री का पहला गीत ‘किसने बांसुरी बजाई’ बहुत लोकप्रिय हुआ. प्रो. नलिन विमोचन शर्मा ने उन्हें प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी के बाद पांचवां छायावादी कवि कहा है कि लेकिन सच्चाई यह है कि वे भारतेंदु और श्रीधर पाठक द्वारा प्रवर्तित और विकसित उस स्वच्छंद धारा के अंतिम कवि थे, जो छायावादी अतिशय लाक्षणिकता और भावात्मक रहस्यात्मकता से मुक्त थी.

शास्त्रीजी ने कहानियां, काव्य-नाटक, आत्मकथा, संस्मरण, उपन्यास और आलोचना भी लिखी है. उनका उपन्यास ‘कालिदास’ भी बृहत प्रसिद्ध हुआ था. इनकी प्रथम रचना ‘गोविन्दगानम्‌’ थी. ‘रूप-अरूप’ और ‘तीन-तरंग’ के गीतों के पश्चात्‌ ‘कालन’, ‘अपर्णा’, ‘लीलाकमल’ और ‘बांसों का झुरमुट’- चार कथा संग्रह कमशः प्रकाशित हुए.

उन्होंने चार समीक्षात्मक ग्रंथ-’साहित्यदर्शन’, ‘चिंताधारा,’ ‘त्रयी’ , और ‘प्राच्य साहित्य’ भी लिखे. 1945-50 तक इनके चार गीति काव्य प्रकाशित हुए-’शिप्रा’, ‘अवन्तिका’,’ मेघगीत’ और ‘संगम’. कथाकाव्य ‘गाथा’ का प्रकाशन सामाजिक दृष्टिकोण से क्रांतिकारी है. इन्होंने एक महाकाव्य ‘राधा’ की रचना की जो सन्‌ 1971 में प्रकाशित हुई.

‘हंस बलाका’ गद्य महाकाव्य की इनकी रचना हिन्दी जगत की एक अमूल्य निधि है. छायावादोत्तर काल में प्रकाशित पत्र-साहित्य में व्यक्तिगत पत्रों के स्वतंत्र संकलन के अंतर्गत शास्त्री द्वारा संपादित ‘निराला के पत्र’ (1971) उल्लेखनीय है.

इनकी प्रमुख कृतियां संस्कृत में- ’काकली’, ‘बंदीमंदिरम’, ‘लीलापद्‌मम्‌’, हिन्दी में ‘रूप-अरूप’, ‘कानन’, ‘अपर्णा’, ‘साहित्यदर्शन’, ‘गाथा’, ‘तीर-तरंग’, ‘शिप्रा’, ‘अवन्तिका’, ‘मेघगीत’, ‘चिंताधारा’, ‘प्राच्यसाहित्य’, ‘त्रयी’, ‘पाषाणी’, ‘तमसा’, ‘एक किरण सौ झाइयां’, ‘स्मृति के वातायन’, ‘मन की बात’, ‘हंस बलाका’, ‘राधा’ आदि हैं.

‘निराला’ बने प्रेरणास्रोत
सहज गीत आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री की पहचान है.उन्होंने छंदोबद्ध हिन्दी कविता लिखी हैं. प्रारंभ में वे संस्कृत में कविता करते थे. संस्कृत कविताओं का संकलन काकली के नाम से 1930 के आसपास प्रकाशित हुआ. निराला जी ने काकली के गीत पढ़कर ही पहली बार उन्हें प्रिय बाल पिक संबोधित कर पत्र लिखा था. बाद में वे हिन्दी में आ गए. निराला ही उनके प्रेरणास्रोत रहे हैं. वह छायावाद का युग था. निराला उनके आदर्श बने.

चालीस के दशक में कई छंदबद्ध काव्य-कथाएं लिखीं, जो ‘गाथा नामक उनके संग्रह में संकलित हैं. उन्होंने कई काव्य-नाटकों की रचना की और ‘राधा` जैसा श्रेष्ठ महाकाव्य रचा. वे कविसम्मेलनों में खूब सुने सराहे जाते थे. उनके गीतों में सहजता का सौन्दर्य है. श्रृंगार उनका प्रिय रस है. उनकी कविताओं में माधुर्य है. सहज सौंदर्य के साथ-साथ वे लोकोन्मुख जनजीवन के कवि हैं.

सम्मान और पुरस्कार
शास्त्री मूलत: गीतकार थे और उनके गीतों में छायावादी गीतों के ही संस्कार शेष हैं. विविधवर्णी रस-भावों में संकलित कोई डेढ़ हजार गीतों की रचना उन्होंने की.उत्तर छायावाद युग के गीतों में उनका विशिष्ट स्थान है, और इनका अपना अलग आकर्षण है. संस्कृत-कविताओं के प्रथम संकलन ‘काकली’ के प्रकाशन के बाद तो इन्हें ‘अभिनव जयदेव’ कहा जाने लगा.
आचार्य जानकी वल्लभ शास्तरी को राजेंद्र शिखर पुरस्कार, भारत भारती पुरस्कार, शिव पूजन सहाय पुरस्कार समेत अनेकों पुरस्कार से उन्हें नवाजा गया. सन् 2010 में भारत सरकार की ओर से उन्हें पद्मश्री देने की घोषणा की गई थी, जिसे किसी विवाद के कारण उन्होंने लौटा दिया था.
96 वर्ष की उम्र में 7 अप्रैल 2011 को हृदयगति रुक जाने से मुजफ्फरपुर स्थित ‘निराला निकेतन’ में आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री का निधन हो गया.

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