तिरंगा और भगवा का घातक घालमेल

कासगंज का दंगा उस दिन हुआ, जब देश गणतंत्र दिवस मना रहा था। इसे हिंदू भी मना रहे थे, तो मुसलमान भी पीछे नहीं थे। लेकिन इस पर भी सांप्रदायिकता का रंग चढ़ा दिया गया। अभी ठीक ठीक किसी को नहीं मालूम कि दंगा क्यों भड़का? आरोप प्रत्यारोपों का दौर जारी है। लेकिन इस हकीकत को नहीं झुठलाया जा सकता कि चंदन गुप्ता नाम के एक युवा की गोली लगने से मौत हो गई।

अब सोशल मीडिया में खबर तैर रही है कि चंदन गुप्ता की मौत उस गोली से हुई, जो तिरंगा यात्रा में शामिल किसी सोनकर नाम के आदमी ने चलाई थी। इस खबर की पुष्टि नहीं हो सकी है। लेकिन इसकी पुष्टि हो चुकी है कि जिस चंदन गुप्ता की मौत पर संघ परिवार आग बबूला है, उसको श्रद्धांजलि देने जुटे लोग हंस रहे थे।

29 जनवरी को भाजपाइयों ने मेरठ में चंदन गुप्ता को श्रद्धांजलि देने के लिए एक शोक सभा रखी थी। शोकसभा में वरिष्ठ भाजपाई हंस रहे थे, मुस्करा रहे थे। क्या कोई किसी को हंसकर श्रद्धांजलि देता है? अजब गजब बात यह है कि हंसते मुस्कराते भाजपाइयों की तस्वीर ‘दैनिक जागरण’ ने प्रकाशित की है।

कोई भी दंगा हो, उसमें जान गरीब लोगों की जाती है। कोई नेता अभिनेता दंगों की भेंट नहीं चढ़ता। चंदन गुप्ता भी ऐसा युवा था, जिसे सामने जीने के लिए पूरी जिंदगी पड़ी थी। उस मां के कलेजे में झांक कर देखिए, जिसके जवान बेटे की लाश उसके सामने हो। दिल दहल जाएगा। लेकिन सत्ता के लिए लाशों पर राजनीति करने वालों के लिए यह बड़ी बात नहीं है। वह लाशों में भी वोट देख लेते हैं। चंदन गुप्ता की श्रद्धांजलि सभा में मुस्कराने वाले भी शायद इसी लिए हंस रहे थे कि हम भले ही चंदन गुप्ताओं को रोजगार नहीं दे पा रहे हैं, लेकिन वे अपनी जान देकर हमारे लिए वोटों का इंतजाम तो कर ही जाते हैं।

मुझे नहीं मालूम कि चंदन गुप्ता बारोजगार था या बेरोजगार? लेकिन इतना तय है कि उसने कभी शायद ही रोजगार के लिए सड़क पर आकर प्रदर्शन किया होगा। सत्ता में बैठे हुए लोग चाहते भी नहीं कि युवा रोजगार की बातें करें, भ्रष्टाचार पर बोलें, किसानों की आत्महत्याओं पर मुखर होकर सामने आएं। सत्ता बनी रही, इसके लिए वे युवाओं को हिंदू मुसलिम में बांट देते हैं। हाथ में तिरंगा थमाकर सड़कों पर उत्तेजक नारे लगाने के लिए तैयार कर देते हैं।

हिंदू युवाओं के सामने मुसलमानों को देश का दुश्मन बताकर पेश किया जा रहा है। यही वजह है कि वह मुसलमानों के विरोध को ही देशभक्ति और राष्ट्रवाद समझ बैठा है। इसलिए तिरंगा यात्राओं में मुसलिम विरोधी नारे आमतौर पर लगाए जाते हैं। वह जब पाकिस्तान मुर्दाबाद का नारा लगाता है, तो यह समझता है कि वह मुसलमानों का विरोध कर रहा है।

पिछले साढ़े तीन सालों में तिरंगा यात्राओं का नया ट्रेंड चला है। तिरंगा को भी सांप्रदायिकता की शान पर चढ़ा दिया गया है। उसमें और ज्यादा कट्टरता लाने के लिए साथ में भगवा झंडा भी जोड़ दिया गया है। अब चाहे राष्ट्रीय पर्व हो या धािर्मक पर्व, तिरंगा और भगवा झंडे का घालमेल कर दिया गया है। ऐसा एहसास कराया जा रहा है कि तिरंगा और भगवा एक ही चीजें हैं।

किसी राष्ट्रीय पर्व में धार्मिक झंडों का और धार्मिक पर्व में तिरंगे का क्या मतलब? युवा कब समझेंगे कि उनके लिए तिरंगा देशभक्ति की निशानी हो सकती है। लेकिन क्या बेरोजगार रहकर देशभक्ति की जा सकती है? युवाओं को समझना चाहिए कि उन्हें देशभक्ति और राष्ट्रवाद की घुट्टी पिलाई ही इसलिए जा रही है, ताकि आप रोजगार की बात न कर सकें।

एक युवा ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘मेरे लिए भूख से ज्यादा अपने देश से प्रेम है।’ ऐसा लिखने वाला युवा जरूर किसी ऐसे आदमी की संतान होगा, जिसे रोटी कमाने की चिंता नहीं होगी। लेकिन यह भी तो कहा गया है कि ‘भूखे पेट तो भजन भी नहीं होता।’ यही तल्ख हकीकत है। भूख इसांन को जानवार बना देती है, बागी बना देती है, चोर बना देती है।

एक गीत की पंक्तियां हैं, ‘दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियां।’ देशभक्ति से इंकार नहीं, लेकिन देशभक्ति की आड़ में सांप्रदायिकता कैसे बर्दाशत की जा सकती है। जो सरकार रोजगार न दे सके, उसके प्रति कैसी निष्ठा? लेकिन हैरतअंगेज तौर पर देश की मौजूदा केंद्र सरकार ने अपने आपको देश के साथ जोड़ दिया है। जो केंद्र सरकार का विरोध करे, वह देशद्रोही और जो समर्थन करे, वह देशभक्त। है न कमाल की बात।

दुर्भाग्य से देश के बहुत युवा सरकार के इस झांसे में आ चुके हैं। यह समझने की जरूरत है कि कोई सरकार देश नहीं हो सकती। सरकार की आलोचना करना देश की आलोचना करना नहीं हो सकता। बहरहाल, केंद्र सरकार अपने मकसद में कामयाब है। उसने युवाओं को देशभक्ति और राष्ट्रवाद का ऐसा झुनझुना दे दिया है, जिसे वह बिना सोचे समझे बजाए जा रहा है। इस झुनझुने की आवाज में उसे यह भी सुनाई नहीं दे रहा कि देश आर्थिक रूप से तबाही की ओर जा रहा है।

बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है, महंगाई सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जा रही है, पेट्रोल डीजल की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई छू रहे हैं। लेकिन युवाओं को देशहित और राष्ट्रवाद के लिए सब मंजूर है। ऐसा राष्ट्रवाद और देशहित देश को रसातल में लेकर जाएगा। अगर युवाओं ने यह झुनझुना बजाना नहीं छोड़ा तो उनके पास पछताने के सिवाय कुछ नहीं बचेगा।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.