चरखे की डोर से संवार रहे लोगों की जिंदगी

खादी के बारे में लगभग सभी जानते हैं कि, “खादी वस्त्र नहीं, विचार है”, इस सूत्रवाक्य के रचयिता महात्मा गांधी हैं और उन्होंने इसकी नींव 1916 में साबरमती आश्रम गुजरात  की थी. इस के बाद लोगों ने अंग्रेजों के परिधानों के बजाय बापू के चरखे को हाथों में उठाया और सूत से तैयार वस्त्र पहनने लगे. यह एक क्रांति थी, जिसके चलते अंग्रेज भी हिल गए थे.

 

हाल ही में कानपुर के मोतीझील स्थित बनारस से आया सोलर चरखा सुर्खियों में है. प्रदेश के कैबिनेट मंत्री ने चरखे को घर-घर पहुंचाने वाले रामखेलावन को सम्मानित कर सोलर चरखे की बारीकियों को परखा और इसे ज्यादा से ज्यादा प्रदेश के गांवों में ले जाने की ऐलान किया.

उनकी ही मुहीम को आगे बढ़ा रहे, बनारस के रामखेलावन. उन्होंने हाल में पत्रिका के साथ बातचीत की. उनकी बातचीत के कुछ पहलू , रामखिलावन उर्फ़ बनारसी बाबू ने बताया कि, हमारे बाबा महात्मा गांधी के सिद्धांतों पर चलते थे और शरीर में अंग्रेजों के बजाय बापू के चरखे से बने कपड़े पहनते लगे. बाबा की धरोहर को पिता ने संभाला और बनारस में खादी के प्रचार-प्रसार के लिए मुहिम छेड़ दी.

महज 18 साल की उम्र में हमने इस काम की बीढ़ा उठाया और चरखे को घर-घर पहुंचने गए. गांधी की धरोहर को संभालने वाले वह तीसरी पीढ़ी के हैं, जबकि चौथी पीढ़ी को भी लाने के लिए दिनरात गांव, गली और कस्बों की खाक छान रहे हैं.

रामखिलावन  ने बताया कि उन्होंने इसका प्रशिक्षण अंबेडकर नगर के अकबरपुर स्थित गांधी आश्रम से 1981 में लिया और इसी के बाद गांव-गांव जाकर महिला-पुरुष, युवक और युवतियों को प्रशिक्षित कर उन्हें स्वलंबी बनाया.

रामखेलावन ने बताया कि बनारस के आसपास के करीब चार सौ गांवों में जाकर 25 सौ महिलाओं को चरखे से सूत बनाने का प्रशिक्षण दिया है. वह महिलाएं हर रोज दो से तीन सौ रूपए कमा कर अपना जीवन बसर कर रही हैं.

रामखेलावन ने आगे बताया कि, सोलर चरखा लेकर हम कानपुर आए और जिले के रमईपुर, साढ़ और मझावन में जाकर वहां महिलाओं को इससे जोड़ा. आज की तारीख में करीब सौ महिलाएं चरखे का प्रशिक्षण लेकर घर में सूत तैयार कर उसे बाजार में बेचकर पैसा कमा रही हैं.

रामखेलावन कहते हैं कि वह यह काम निशुल्क करते हैं और आने-जाने का खर्चा खुद उठाते हैं. अब खादी ग्रामोद्योग के अधिकारी भी उन्हें बुलाते हैं और गांव-गावं लेकर जाते हैं.

रामखेलावन ने बताया कि अस्सी के दशक में हम अपने पिता के साथ सूत लेकर कानपुर आते थे और बेचकर अच्छा मुनाफा कमाते थे. देश में होजरी की सबसे ज्यादा खपत और बिक्री, कोलकाता, तमिलनाड़ु और कानपुर में होती थी. हम बनारसी लोग कानपुर को होजरी का हब कहा करते थे.

लेकिन सरकारों की उपेक्षा के चलते चरखा और सूत कहीं गुम हो गए. बड़े-बड़े कारीबरों ने अपना काम बदल लिया और गांधी की विरासत खात्में की तरफ बढ़ रही थी.

रामखेलावन ने बताया कि, आजादी के बाद खादी का प्रचार-प्रसार पीएम मोदी और सीएम योगी की सरकार आने के बाद गति मिली है. बेरोजगार युवक नौकरी की जगह गांवों में मुद्रा बैंक के जरिए लोन लेकर छोटे-छोटे प्लांन्ट डाल सकते हैं.

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