हिंदी पर सुषमा और थरूर की संसद में नोक-झोंक

हिंदी को संयुक्त राष्ट्र में आधिकारिक भाषा बनाने के मुद्दे पर बुधवार को लोकसभा में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और कांग्रेस नेता शशि थरूर के बीच तीखी नोक-झोंक देखने को मिली. लक्ष्मण गिलुवा और रमा देवी के पूरक प्रश्न के जवाब में सुषमा ने बताया कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र में एक आधिकारिक भाषा के तौर पर मान्यता दिलाने के लिए प्रयास जारी हैं, लेकिन प्रक्रिया इसमें बाधक बन रही है.

 

मगर प्रश्नकाल के दौरान शशि थरूर ने सवाल दागा कि आखिर इस प्रयास की जरूरत ही क्या है. थरूर ने कहा कि आने वाले समय में हो सकता है कि भविष्य के प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री तमिलनाडु से हो. इसके बाद सुषमा ने भी पलटवार अपने जवाब में उन्हें ‘अज्ञानी (इग्नोरेंट)’ कहा.

थरूर के बयान पर सत्ता पक्ष ने विरोध किया. सुषमा स्वराज ने थरूर के बयान पर टिप्पणी करते हुए कहा, “हिंदी को कई देशों में भारतीय प्रवासी भी बोलते हैं. यह कहना कि हिंदी केवल भारत में बोली जाती है, यह आपकी ‘अज्ञानता’ है.” उन्होंने अपने लिखित जवाब में कहा कि भारत हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए 129 देशों के संपर्क में है.

दरअसल बात , लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान सुषमा ने बुधवार को कहा था कि संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने के लिए यदि जरूरत पड़ी तो सरकार 400 करोड़ रुपए खर्च करने से पीछे नहीं हटेगी. इस पर कांग्रेस के सांसद शशि थरूर ने कहा कि हिंदी केवल भारत की आधिकारिक भाषा है, वह राष्ट्रभाषा नहीं है ऐसे में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए भारत को प्रयास क्यों करना चाहिए?

सुषमा स्वराज के सदन में तर्क

सुषमा स्वराज ने एक सवाल के जवाब में कहा, “यह अक्सर पूछा जाता है कि संयुक्त राष्ट्र में हिंदी एक अधिकारिक भाषा क्यों नहीं है. आज, मैं सदन से कहना चाहूंगी कि इसके लिए सबसे बड़ी समस्या इसकी प्रक्रिया है.”

सुषमा स्वराज ने बताया कि नियम के अनुसार, “संगठन के 193 सदस्य देशों के दो-तिहाई सदस्यों यानी 129 देशों को हिंदी को अधिकारिक भाषा बनाने के पक्ष में वोट करना होगा और इसकी प्रक्रिया के लिए वित्तीय लागत भी साझा करनी होगी.” उन्होंने कहा, “इसके संबंध में मतदान के अलावा, देशों के ऊपर राशि का अतिरिक्त भार भी है. हमें समर्थन करने वाले आर्थिक रूप से कमजोर देश इस प्रक्रिया से दूर भागते हैं. हम इस पर काम कर रहे हैं, हम फिजी, मॉरिशस, सूरीनाम जैसे देशों से समर्थन लेने की कोशिश कर रहे हैं, जहां भारतीय मूल के लोग रहते हैं.”

  • सुषमा स्वराज ने कहा, “जब हमें इस तरह का समर्थन मिलेगा और वे लोग वित्तीय बोझ को भी सहने के लिए तैयार होंगे, तो यह आधिकारिक भाषा बन जाएगी.”
  • जब एक सदस्य ने हिंदी को अधिकारिक भाषा बनाए जाने को लेकर इस ओर इशारा किया कि इसमें प्रतिवर्ष 40 करोड़ रुपये की लागत आएगी, तब स्वराज ने कहा, “40 करोड़ रुपये ही नहीं, बल्कि सरकार इस पर 400 करोड़ रुपये खर्च करने के लिए तैयार है.”
  • हालांकि, सुषमा स्वराज ने कहा कि लेकिन राशि खर्च करने से उद्देश्य की प्राप्ति नहीं होगी. सुषमा स्वराज ने इस बात की ओर इशारा किया कि उन्होंने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दिया था.
  • सुषमा स्वराज ने कहा, “जब हमारे यहां विदेशी मेहमान आते हैं, और अगर वे अंग्रेजी में बोलते हैं तो हम भी अंग्रेजी में बोलते हैं. अगर वे अपनी भाषा में बोलते हैं, तो हम हिंदी में बोलते हैं. जहां तक भाषा की गरिमा का सवाल है, विदेश मंत्रालय ने अबतक हिंदी में ज्यादा काम नहीं किया है.”

शशि थरूर के सदन  में तर्क

  • संयुक्त राष्ट्र में काम कर चुके और संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद के लिए वर्ष 2006 में हुए चुनाव में दूसरा स्थान प्राप्त करने वाले थरूर ने हिंदी को आगे बढ़ाने पर सवाल उठाया और कहा कि हिंदी भारत की राष्ट्रीय भाषा भी नहीं है.
  • उन्होंने कहा, “हिंदी राष्ट्रीय भाषा नहीं है, यह आधिकारिक भाषा है.
  • हिंदी को आगे बढ़ाने पर एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है.
  • हमें संयुक्त राष्ट्र में अधिकारिक भाषा की क्या जरूरत है? अरबी, हिंदी से ज्यादा नहीं बोली जाती है, लेकिन यह 22 देशों में बोली जाती है. हिंदी केवल एक देश (हमारे देश) की आधिकारिक भाषा के तौर पर प्रयोग की जाती है.”

थरूर ने कहा-

“प्रश्न यह है कि इससे क्या प्राप्त होगा. अगर इसकी जरूरत है तो हमारे पास प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री हैं, जो हिंदी में बोलना पसंद करते हैं, वे ऐसा करते हैं और उनके भाषण को अनुवाद करने के लिए राशि अदा कर सकते हैं. आने वाले समय में हो सकता है कि भविष्य के प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री तमिलनाडु से हो.” उन्होंने कहा, “सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी है. मैं हिंदी भाषी क्षेत्र के लोगों के गर्व को समझ सकता हूं, लेकिन इस देश के लोग जो हिंदी नहीं बोलते हैं, वे भी भारतीय होने पर गर्व महसूस करते हैं.”

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