भारत- पाकिस्तान के रिश्तों पर जमी बर्फ को तोड़ने का समय आ गया

( यह लेख मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था, जिसे विख्यात पत्रकार “सुहासिनी हैदर” ने “द हिंदू” अखबार के लिए लिखा था, पेश है Time for an icebreaker: on India-Pakistan relations का हिंदी अनुवाद )

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1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच दूरियों का बढ़ते जाना लाज़मी था, लेकिन पूरी तरह से ऐसा हुआ नहीं. हालाँकि उस दौर का एक किस्सा काफी रोचक है, भारत के विदेश मंत्रालय में पाकिस्तान मामलों से जुड़े मसले देखने वाले एक अधिकारी की मीटिंग उस दौर के नवनिर्वाचित पाकिस्तान के हाई कमिश्नर से हो रही थी. और उस बातचीत के दौरान पाकिस्तान के हाई कमिश्नर ने एक अजीबो गरीब निवेदन किया, उन्होंने कहा “कृपया पाकिस्तान को एक विदेशी राष्ट्र के रूप में देखा जाये”. उन्होंने इसका कारण समझाते हुए आगे कहा, “चूँकि भारतीय अधिकारी पाकिस्तान की भाषा एवं संस्कृति से खासे वाकिफ हैं, इसलिए शायद उन्हें पाकिस्तान को एक विदेशी राष्ट्र के रूप में स्वीकार करने में मुश्किलें आ सकती हैं, लेकिन मैं आपको बता दूँ की हमारा देश (पाकिस्तान) एक जुदा राष्ट्र है”.

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तात्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के घर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

हालाँकि दोनों देशों का बंटवारा सन 1947 में ही हो चुका था, लेकिन बौद्धिक स्तर पर दोनों देश एक दूसरे से अलग नहीं हो पा रहे थे, 1947 में भले ही दोनो तरफ के नागरिकों के लिए बॉर्डर पार करके एक दूसरे राष्ट्र में जाने के लिए पासपोर्ट का प्राविधान कर दिया गया था लेकिन मानसिक स्तर पर वो एक दूसरे से बेहद जुड़े हुए थे. दशकों बाद आज पाकिस्तान के किसी अफसर की तरफ से इस तरह का न तो निवेदन आएगा न इस सन्दर्भ में कोई शिकायत, आज भारत और पाकिस्तान पूरी तरह से जुदा दो राष्ट्र हैं, जिनके बीच मानसिक/बौद्धिक स्तर का पूरी तरह से विभाजन हो चुका है. और इस विभाजन ने इन दोनों राष्ट्रों को अच्छा ख़ासा दूरी पर खड़ा कर दिया है, जिनके बीच वार्तालाप एवं सामंजस्य की संभावनाएं कम हो गयी हैं, बावजूद इसके की २ साल पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाहौर जाकर पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति नवाज शरीफ की बेटी की शादी में शरीक हुए और अपने आप में दोस्ती की एक अनूठी पहल की थी.

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अगर शुरुवात से भारत पाकिस्तान के संबंधों पर गौर किया जाए तो हम यह पाएंगे की विभाजन के ठीक बाद से दोनों राष्ट्रों के बीच तहज़ीबी एवं सांस्कृतिक दूरियां के आने की शुरुवात हो गयी थी. 1950 के बाद से दोनों राष्ट्रों के कवी/शायर/इतिहासकार/बुद्धजीवियों ने अपने अपने राष्ट्र के लिए जुदा इतिहास तैयार किया और इसका उदहारण हमे पाकिस्तान के छात्रों को मिल रही शिक्षा में मिलता है. अब वहां छात्र उर्दू (जोकि भारतवर्ष में विकसित एक भाषा है) से ज्यादा अरबी भाषा सीखते और पढ़ते हैं; अब उनके इतिहास में उन्हें विदेशी आक्रमणकारियों के बारे में तो बताया जाता है लेकिन केवल वही आक्रमणकारी जो की पश्चिम(आज के पाकिस्तान का क्षेत्र) से आये न की जो पूर्व से आये (आज के भारत का क्षेत्र).

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भारत की तरफ से भी मौजूदा सांस्कृतिक दूरियां पैदा की गयी हैं, उदहारण के तौर पर मशहूर गायिका आबिदा परवीन और गायक ग़ुलाम अली (दोनों पाकिस्तान के नागरिक) अब भारत में आकर किसी कार्यक्रम में शिरकत नहीं करते क्यूंकि उन्हें किसी आयोजनकर्ता की तरफ से न्योता नहीं मिलता. यही हाल अन्य पाकिस्तान के नायक-नायिकाओं का भी है. हालाँकि खेलकूद (खासकर के क्रिकेट) में आज भी उतनी दूरी नहीं है, लेकिन फिर भी दोनों देशों में से किसी की भी एक दूसरे के हाथों पराजय, उस देश के लिए एक राष्ट्रीय असम्मान की बात हो जाती है. वीज़ा/पासपोर्ट के मामले में भी दोनों देशों ने कड़ी स्क्रूटिनी करने वाले नियम बनाये हैं, जिससे के दूसरे देश के नागरिकों का आना बेहद मुश्किल है. दो राष्ट्र, जो कभी एक दूसरे का अभिन्न हिस्सा रहे हैं और जिनके बीच भाषा, धर्म, इतिहास की इतनी समानताएं हैं, वे आज एकदूसरे से बेहद दूरी पर खड़े नजर आते हैं. यह दूरी इतिहास में दोनों राष्ट्रों के बीच युद्ध के दौरान भी नहीं रही है.

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व्यापर के क्षेत्र में भी अत्यंत दूरियां हैं, जहाँ भारत की ईरान और अफ़ग़ानिस्तान से नजदीकी पाकिस्तान को खल रही है तो वहीँ पाकिस्तान की चीन से निकटता भारत के लिए चिंता का सबब है.सीमा पर दोनों देशों के बीच तनातनी जगजाहिर है, जहाँ हर रोज किसी न किसी प्रकार का ‘सीज़फायर’ का उल्लंघन होता है और इलज़ाम दोनों देश एक दूसरे पर देते हैं. हाल की सीमा के निकट आतंकवादी घटनाओं ने स्थितियां और ज्यादा गंभीर की हैं.

आतंकवाद के मसले पर दोनों देश एक दूसरे से बातचीत के मंच पर आने को तैयार नहीं. 26/11 (मुंबई हमले) के बाद हालाँकि पाकिस्तान ने कई मंचो से यह प्रतिबद्धता दिखाई की वो हमले के दोषियों को सजा दिलाने का हरसंभव प्रयास करेगा.लेकिन पिछले तीन सालों में रावलपिंडी में चल रहे मुंबई हमले की सुनवाई रोक दी गयी है. लश्कर-ऐ-तैयब्बा का कमांडर ज़कीउर रेहमान लखवी बेल पर बाहर है जबकि 26/11 का मास्टरमाइंड माना जाने वाला हाफ़िज़ सईद, जोकि हिरासत से अभी तक दूर है, पाकिस्तान में 2018 में होने वाले चुनावों में अपना भाग्य आज़माने की तैयारी में है. पाकिस्तान की ओर से यह माना जाता है की पाकिस्तान के एक संगठन तहरीक-ऐ-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को भारत फण्ड करता है और बलूचिस्तान में मौजूद कई संघर्षशील संगठनों को भी भारत मदद पहुंचता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर भाषण में बलूचिस्तान के लोगों का जिक्र करना पाकिस्तान को बहुत खला था.

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कुलभूषण यादव की रिहाई का मसला, जोकि मामूली परिस्थितियों में बातचीत से सुलझ सकता था, आज अंतरराष्ट्रीय न्यायलय (ICJ) में लंबित है.

हाल ही में भारत और पाकिस्तान, दोनों ने एक दूसरे की एम्बेसी में अपना नया हाई कमिश्नर नियुक्त किया है, लेकिन दोनों देशों के बीच कठिन मसलों पर बातचीत के आसार बहुत कम ही माने जा रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गुजरात चुनाव के दौरान मनमोहन सिंह का पाकिस्तान के साथ मिलकर उनके खिलाफ साजिश रचने वाले बयान पर दोनों राष्ट्रों के बीच दूरियों में इजाफा ही हुआ है.

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इसके अलावा और कई मसलों की वजह से भी दूरियां बढ़ी हैं, भारत ने हमेशा तीसरे पक्ष ki दोनों राष्ट्रों के बीच सुलह करवाने में भूमिका को नाकारा है, लेकिन आज दो-तरफ़ा बातचीत न होने की वजह से हालात यह हैं की दोनों देशों से जुड़ा हर मसला अंतरार्ष्ट्रीय मंच पर जाता हुआ दिखता है. सिंधु जल विवाद के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ, फाइनेंसियल एक्शन टास्क फाॅर्स, इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस एंड विश्व बैंक की सहभागिता इसका परिणाम है.

भारत का पाकिस्तान में आयोजित हुए ‘दक्षेस समिट’ से दूरी बनाना भी इसका ही एक उदहारण है. भारत और पाकिस्तान के  बीच बढ़ती दूरियां भविष्य की सरकारों के लिए खतरे की घंटी है. दोनों देश बिना सीधा संवाद किये भी एक दूसरे से सामंजस्य बिठा सकते हैं; पर्यावरण, पर्यटन, एनर्जी पाइपलाइन और बिजली की क्षेत्र में दोनों देश आपसी सहमति से कार्य कर सकते हैं.

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