तलाक़-ए-बिदत (इंस्टेंट ट्रिपल तलाक ), भारत में गैरक़ानूनी

मोदी सरकार ने अहम फैसला लेते हुए कैबिनेट में ट्रिपल तलाक विधेयक को मंजूरी दे दी है. सुप्रीम कोर्ट से इंस्टेंट ट्रिपल तलाक बैन किए जाने के बाद मोदी सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. अब इस बिल को संसद की मंजूरी के लिए दोनों सदनों में रखा जाएगा. यह कानून मुस्लिम महिलाओं को तलाक़-ए-बिदत  से राहत दिलाएगा.

ज्ञात रहें कि, सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मुसलमानों में बीच के कुछ वर्षों से प्रचलित एक बार में तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत को असंवैधानिक करार देकर निरस्त कर दिया था. क्योंकि यह तरीक़ा इस्लाम के तलाक़ के नियमों के विरुद्ध है, जो नियम कुरान में मौजूद हैं. कोर्ट ने तीन-दो के बहुमत से फैसला देते हुए कहा था कि एक साथ तीन तलाक संविधान में दिए गए बराबरी के अधिकार का हनन है, और कुरान व इस्लाम के खिलाफ़ है. तलाक-ए-बिद्दत इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है. इसलिए इसे धार्मिक आजादी के तहत संरक्षण नहीं मिल सकता.

गृह मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाले अंतर-मंत्रालयी समूह ने विधेयक का मसौदा तैयार किया था. इस समूह में वित्त मंत्री अरूण जेटली, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद और कानून राज्य मंत्री पी पी चौधरी शामिल थे. मुस्लिम महिला (विवाह अधिकारों का संरक्षण) बिल, 2017 के तहत  जुबानी, लिखित या किसी इलेक्ट्रॉनिक तरीके से एकसाथ तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को गैरकानूनी बनाया जाएगा. संसद के दोनों सदनों से पास होने के बाद यह कानून बन जाएगा.

कानून मंत्रालय ने लगभग एक पखवाड़े पहले तीन तलाक पर प्रतिबंध लगाने और इसे एक दंडनीय और गैर-जमानती अपराध बनाने से जुड़े प्रस्तावित कानून पर सभी राज्य सरकारों से राय मांगी थी. जिसमें  उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, झारखंड, असम, मणिपुर और छह अन्य राज्यों ने ड्राफ्ट बिल पर सरकार का समर्थन किया है, जबकि अन्य राज्यों के जवाब का अभी तक दिया नहीं, उनका इंतजार  किया जा रहा है.

ज्ञात होकि शरियत कानून में तलाक़-ए-बिदत को गैरइस्लामी कृत्य माना जाता है. यह संयोग ही होगा कि मोदी सरकार ने इस्लामी शरियत क़ानून के हिसाब से ही तलाक़ के इस तरीके को असंवैधानिक मानते हुए, मुस्लिम महिला बिल ला रही है.

बिल में प्रावधान
  • बिल के प्रारुप के मुताबिक एक वक्त में तीन तलाक (बोलकर, लिखकर या ईमेल, एसएमएस और व्हाट्सएप जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से) गैरकानूनी होगा.
  • एक बार में तीन तलाक गैरकानूनी और शून्य होगा. ऐसा करने वाले पति को तीन साल के कारावास की सजा हो सकती है. यह गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध माना जाएगा.
  • ड्रॉफ्ट बिल के मुताबिक एक बार में तीन तलाक या ‘तलाक ए बिद्दत’ पर लागू होगा और यह पीड़िता को अपने और नाबालिग बच्चों के लिए गुजारा भत्ता मांगने के लिए मजिस्ट्रेट से गुहार लगाने की शक्ति देगा.
  • पीड़ित महिला मजिस्ट्रेट से नाबालिग बच्चों के संरक्षण का भी अनुरोध कर सकती है. मजिस्ट्रेट इस मुद्दे पर अंतिम फैसला करेंगे.
  • प्रस्तावित कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू होगा है.
क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने 3:2 के मत से सुनाए गए फैसले में तीन तलाक को कुरान के मूल तत्व के खिलाफ बताया. कोर्ट ने कहा था कि मुस्लिमों में तीन तलाक के जरिए दिए जाने वाले तलाक की प्रथा अमान्य, अवैध और असंवैधानिक है. प्रधान न्यायाधीश जे एस खेहर और जस्टिस एस अब्दुल नजीर जहां तीन तलाक की प्रथा पर छह माह के लिए रोक लगाकर सरकार को इस संबंध में नया कानून लेकर आने के लिए कहने के पक्ष में थे. वहीं जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस आर एफ नरीमन और जस्टिस यू यू ललित ने इसे संविधान का उल्लंघन करार दिया था. इस पीठ में खेहर के अलावा, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ, न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन, न्यायमूर्ति यू यू ललित और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल थे.

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