मुस्लिम विद्वानों के कड़े कदमों के बिना चरमपंथ का ख़ात्मा संभव नहीं

24 नवम्बर 2017 की शाम एक दिल दहला देने वाली खबर का नोटिफिकेशन मेरे मोबाइल फ़ोन पर आया। मिस्र के सिनाई प्रान्त की एक मस्जिद में आतंकवादी हमला हुआ है जिसमें करीब 200 लोगों के मारे जाने की आशंका है। मुझे याद आया कि कुछ दिनों पहले ऐसी ही एक खबर नाइजीरिया से भी आई थी। आज जब मैं मिस्र की खबर को विस्तार से पढ़ रहा हूँ तो मुझे ये पता चल रहा है कि ये हमला दरअसल जुमे (शुक्रवार) की नमाज़ के दौरान हुआ था और जिसमें कुल 224 लोगों की जान चली गयी। मारे जाने वालों में 25 बच्चे भी हैं। हमलावरों का सम्बन्ध ISIS से बताया जा रहा है। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि कुछ फिदायीन हमलावर तो नमाज़ियों के बीच मौजूद थे जिन्होंने खुद को विस्फ़ोटक पदार्थों से लैस किया हुआ था और कुछ हमलावर मशीनगन लेकर बाहर से हमला कर रहे थे। उन्होंने उन सुरक्षाकर्मियों और एम्बुलेंस पे भी हमला किया जो लोगों की मदद के लिए मस्जिद की तरफ़ जा रहे थे। बताया जा रहा है कि हमलावरों ने मस्जिद ही के पास मौजूद बच्चों के एक किंडर-गार्डन स्कूल पे भी हमला किया था। ये मिस्र के इतिहास में अब तक का सबसे भीषण आतंकवादी हमला था।

वह मस्जिद जहाँ आतंकवादी हमला हुआ था

ऐसी न जाने कितनी ही खबरें हम पढ़ते और सुनते हैं और फ़िर भूल जाते हैं। कुछ दिन न्यूज़ चैनलों और सोशल मीडिया पे बहस होती है या कभी-कभी चुनावी खबरों की वजह से किसी दूसरे देश में हुए आतंकवादी हमले को हम इतनी तवज्जोह भी नहीं देते हैं। कुछ लोग इसका दोष इस्लाम धर्म और मुसलमानों की सोच को देते हैं तो कुछ मुसलमान इसे अमेरिका-इजराइल की साज़िश कहते हैं। कुछ इसे वहाबी और सूफ़ी मुसलमानों के बीच की लड़ाई क़रार देते हैं तो कुछ शिया और सुन्नी की। लेकिन बहसों के बाद भी हम लोग इस समस्या के किसी हल तक नहीं पहुंच पाते। महज़ बहस करके ही हम सोच लेते हैं कि हमने बहोत बड़ा काम कर दिया है। कुछ ये सोचकर ख़ुश हो जाते हैं कि आज तो हमने इस्लाम और मुसलमानों की सच्चाई को पूरी दुनिया के सामने टीवी पर बता ही दिया तो कुछ ये सोचकर ख़ुश हो जाते हैं कि वाह क्या मुंहतोड़ जवाब दिया है आज मौलाना साहब ने टीवी पर, सबका मुंह ही बंद कर दिया। जिन परिवारों के लोग ऐसे हमलों में मारे जाते हैं उनका दुःख-दर्द और उनकी आह इन टीवी बहसों की तेज़ आवाज़ में कहीं दबकर रह जाती है।

आतंकवादी हमले के बाद खून से लथपथ मस्जिद की जानमाज़

आज मैं आप से इस आर्टिकल के जरिये से इस समस्या की जड़ और उसके समाधान पर कुछ बात कहना चाहता हूँ। ऐसा नहीं है कि कोई सरफिरा नौजवान एक ही दिन में बंदूक उठाकर या बम वाली जैकेट पहनकर आत्मघाती हमलावर बन जाता है। हाथ में बंदूक थमाने से पहले दिमाग में ज़हर भरा जाता है, कट्टरपंथ का ज़हर। उसे बताया जाता है कि सच सिर्फ़ यही है, उसे किसी और की बात सुनने की ज़रूरत नहीं है। उसे बताया जाता है कि हमारे जैसे कुछ लोगों को छोड़कर सारी दुनिया के लोग विधर्मी हो चुके हैं। अमेरिका, इजराइल और सारे पश्चिमी देश इस्लाम के दुश्मन हैं और वो इस्लाम से जंग लड़ रहे हैं। सभी मुस्लिम देशों के हुक्मरान इन पश्चिमी आकाओं के ग़ुलाम हैं और वो सब अब मुसलमान नहीं रहे बल्कि वो तो मुर्तद्द (अधर्मी) हो चुके हैं। ये लोकतान्त्रिक चुनावी प्रक्रियाएं महज़ पश्चिम का एक जाल है लोगों को अपना ग़ुलाम बनाए रखने के लिए। लोकतंत्र इस्लाम के विपरीत है। इस्लाम में खिलाफ़त होती है न कि लोकतंत्र। पश्चिमी देशों की जनता चूँकि अपनी सरकारों को टैक्स देती है और उसी पैसे से ये देश इस्लाम के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं लिहाज़ा वो जनता भी इस युद्ध में शामिल है। हम उन लोगों को जब चाहें, जैसे चाहें हमला करके मार सकते हैं। जो मुसलमान लोकतंत्र के समर्थक हैं वो सब भी विधर्मी हो चुके हैं और पूरी तरह वाजिबुल क़त्ल (मृत्युदंड के भागी) हैं। खुद्कुश हमले (सुसाइडल अटैक) पूरी तरह से जायज़ हैं। निहत्थों, औरतों और बच्चों तक को मारना पूरी तरह जायज़ है। हमारा मकसद इस दुनिया में इस्लाम की एक वैश्विक सत्ता (खिलाफ़त) कायम करना है ताकि दुनिया के लोगों को अधर्म से बचाया जा सके और दुनिया में अमन क़ायम किया जा सके। (कितना हास्यास्पद है!) संयुक्त राष्ट्र संघ भी इस्लाम का दुश्मन है और इस संघ का हर सदस्य देश इस्लाम के ख़िलाफ़ लड़ रहा है। इस प्रकार इस दुश्मनी के दायरे में लगभग पूरी दुनिया ही आ जाती है।

आप सोच रहे होंगें कि ये सब बातें कोई नौजवान किस तरह मान सकता है! मैं कहता हूँ बिल्कुल मान सकता है जबकि ये सब बातें उसे कुरआन और हदीस (पैगम्बर मोहम्मद के कथन और कर्म ) के हवाले से बतायी जाएं। जब उसे दुनिया में जगह-जगह मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार की दास्तानें सुनाई जाएँ और तस्वीरें और वीडियो दिखाए जाएं। जब उसे जीने और मरने का एक क्रांतिकारी मकसद दे दिया जाए तब एक नौजवान ज़रूर इन बातों को मान लेता है और कभी बाज़ारों पे, कभी किसी स्कूल पे तो कभी यहाँ तक की मस्जिद में नमाज़ पढ़ रहे लोगों पे भी हमला करने को तैयार हो जाता है। वो अपनी ज़िन्दगी तक खत्म करने को तैयार हो जाता है।

अपने पाने परिजनों की लाश ढूँढते लोग

अब सवाल उठता है कि क्या ये बहकी हुई विचारधारा ही असल इस्लाम है? एक मुसलमान होने के साथ-साथ इस्लाम धर्म का विद्यार्थी होने की हैसियत से भी, मैं पूरी ईमानदारी से कहता हूँ कि ऐसा हरगिज़ नहीं है। कुरआन की जिन आयतों और पैगम्बर साहब की जिन हदीसों (बातों) का हवाला देकर कुछ लोग मुस्लिम नौजवानों को गुमराह कर रहे हैं, वो दरअसल उन आयतों और हदीसों की व्याख्या अपनी गलत सोच मुताबिक़ कर रहे हैं। ऐसे लोगों को विस्तार से जवाब देने के लिए तो मेरे पास बहुत कुछ है लेकिन यहाँ फ़िलहाल मैं क़ुरान की एक ही आयत का हवाला देना चाहूँगा। सूरः नं. 5 अल-माइदा की आयत नं 33, जिसके अनुसार जिसने किसी एक इंसान को नाहक़ क़त्ल किया उसने पूरी इंसानियत को क़त्ल किया।

आज पूरी दुनिया के इस्लामिक विद्वानों को इन दहशतगर्द ताकतों को मुंहतोड़ जवाब देना चाहिए तब खत्म होगा आतंकवाद। ये बात भी मैं पूरी ईमानदारी से कहता हूँ, कि कुछ एक को छोड़कर पूरी दुनिया के इस्लामिक विद्वानों को जिस बड़े स्तर पर इस  विचारधारा का जवाब देना था, वो उन्होंने नहीं दिया है। सिर्फ़ आतंकवादियों के ख़िलाफ़ फतवा दे देने से या ये कह देने से कि आतंकवादी मुसलमान नहीं हैं, इस्लामिक विद्वान् इस वैश्विक समस्या से अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते। ये उनकी ज़िम्मेदारी है कि वो मुसलमानों की सही रहनुमाई करें और ऐसे गुमराह लोगों से ख़ास तौर पर मुस्लिम नौजवानों को बचाएं। वरना ये बीमारी इतनी ज़्यादा बढ़ जाएगी जिसकी आज हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

इराक़, सीरिया और समूचे मध्य पूर्व के हालात हम आज देख ही रहे हैं। अगर अब भी न जागे तो किसी दिन सोते ही रह जाएंगें। इस्लामिक विद्वानों को चाहिए कि उन मुद्दों पर खुलकर बहस करें जो नज़रिया ये दहशतगर्द लोग पेश कर रहे हैं। वो कौनसी क़ुरआनी आयतें और हदीसें हैं जिनकी ये  समूह ग़लत व्याख्या कर रहे हैं?

क्या वाक़ई इस्लाम अपने मानने वालों को एक वैश्विक सत्ता बनाने को कहता है? क्या लोकतंत्र इस्लाम के ख़िलाफ़ है? किसी को विधर्मी घोषित कर उसकी हत्या करने  का अधिकार क्या ईश्वर ने किसी को दिया है? जिहाद की वास्तविकता क्या है? इसके साथ ही अनेक ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं जिन पर समूची मुस्लिम दुनिया में खुलकर बहस होनी चाहिए और मुस्लिम नौजवानों को इस बहस में शामिल किया जाना चाहिए। सिर्फ़ यही तरीका है इस बीमारी को जड़ से खत्म करने का। सारी दुनिया के देश की सेनाएं मिलकर भी अगर दुनिया के एक-एक आतंकवादी को ढूंढ-ढूंढ कर मार डालें तो भी दुनिया से कभी आतंकवाद ख़त्म नहीं होगा जब तक कि हम इस चरमपंथी विचारधारा को ख़त्म नहीं कर देते।

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