फ़िल्म पदमावती के विरोध और समर्थन में राजनीति

लगातार फ़िल्म के निर्देशन की कारण घेरे जाने वाले मशहूर फिल्म निर्देशक संजय लीला भंसाली ओर पूरी कास्ट टीम भी पद्मावती के तथाकथित विवाद पर चुप्पी तो तोड़ चुके है पर वो चुप्पी भी एक औपचारिक एवम शालीनता वाली दिखी इसके उलट विरोधी समाज की भाषा और दावो पर गौर किया जाये तो उसमें वास्तविकता के अलावा राजनीति ज्यादा झलकती नजर आ रही है । यही अंतर एक बहेतर समाज की कल्पना में अड़ंगे डालने का बड़ा काम करता है ।

तार्किक होना अच्छी बात है हित के लिए लड़ना अच्छी बात है, क़ौम के लिए लड़ना उससे भी वीरता है जो राजपुताना शानो में एक है। परंतु आज जिस तरह राजपूत तबका पूरे समाज मे दिख रहा है वो असलियत से कही अलग दिख रहा है । किसी भी ऐतिहासिक फ़िल्म को बनाने के लिए बहुत अधिक शोध किया जाता है तब कही जाकर फ़िल्म को पर्दे पर उतारा जाता है ।

विवादों से घिरे होने के कारण कई न्यूज़ चैंनल भी इस मुद्दे को ठीक ढंग से समझाने की भी कोशिश कर रहे है और दूसरी ओर कई चैंनल उसी गर्म मुद्दे की बाल की खाल निकालने में लगे हुए है । रोटियां सेकी जा रही गई हैं।

रजत शर्मा के इसी मुद्दे पर हुए प्राइम टाइम शो के आधार पर कई चीजों को जनता के समक्ष स्पष्ट रूप से रखा गया। जिसमे उन्हें ये तक भी कह दिया कि मैने खुद फ़िल्म को देख है जिसमे इस तरह का कोई सीन नजर नही आया जिसके प्रति ये सब बखेड़ा मचाया जा रहा है । अपील करते हुए उन्होंने कहा कि आप अपने संगठन के बड़े और विवेकपूर्ण शक्श को भेजे हम उन्हें फ़िल्म दिखाते है और उनसे सीधे इस मुद्दे पर बात करेंगे ।इसके उलट विरोधी समाज के स्वर के साथ साथ कई बीजेपी नेता जबरदस्ती मैदान में कूदने को उतारू है जिसमे कांग्रेस नेता शशि थरूर और हरयाणा बीजेपी के प्रमुख मीडिया कॉर्डिनेटर, अभिनेताओ के सर काटने ओर जलाने की बात करते है. तो ये सिर्फ राजनीति के अलावा और कुछ तो समझ नही आता है। 10 करोड़ जैसी बड़ी रकम आप इस काम के लिए देने को तैयार है । तो शरम आनी चाहिए । करणी सेना और भगवा दलों की राजनीति वक्ती तौर पर जागती है, ये साबित फिर से हो गया है। बेहतर होता कि आप भड़काऊ भाषण न देते हुए इत्मिनान से सभा आयोजित कर निर्णय निकालते

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