क्या मुस्लिम सियासी मुहब्बत और सियासी नफ़रत से बाहर आयेंगे ?

मौलाना आज़ाद ने क्या किया, क्या नहीं किया और वह क्या और कर सकते थे, इस पर खूब बहस हो सकती है. नेहरू को भी हम सुक़ूत-हैदराबाद जो होम मिनिस्टर पटेल के दौर में हुआ और उस क़त्ल आम, उसके लिए उन पर ऊँगली उठाते हैं. लेकिन ये भी सच है कि मौलाना आज़ाद की शख्सियत की वजह से बोहत कुछ बच गया और 47 के बाद के दौर में जब लाखों हिन्दू-मुसलमान मारे गए थे, भारत आये लाखों रिफ्यूजियों में एक बोहत बड़ी तादाद अपने साथ उत्तर भारत में मुसलमानों के लिए नफरत ले कर आई थी. अर्बन सेंटर यानी शहर जिनसे मुल्क की तहज़ीब बनती है, ख़ुसूसन देहली मुसलमानों से खाली हो चूका था. देहली में जो मुस्लिम आबादी बच गयी, पनाहगुज़ीन की तरह रह रहे मुसलमान, उनको आज़ाद के देहली में होने की वजह से बड़ी तक़वियत थी.

यूपी के हालात का तो अंदाजा तो सिर्फ उस अहद की जनरेशन ही कर सकती है, जिन्होंने झेला है और जो जानते हैं. पटेल के पास होम था, पुलिस थी, इंटेलिजेंस था, गांधी पर कई हमले हो चुके थे फिर भी सिक्योरिटी नहीं बढ़ी और उनके होम मिनिस्टर होते हुए गांधी का क़त्ल हुआ, जो उनके करियर पर एक धब्बा है (जिसकी बात नहीं की जाती), कितना बड़ा फेलियर, इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स के बावजूद देहली में बाबा-ए -क़ौम मार दिए गए. उस ज़माने की कांग्रेस कैसी थी. पुरुषोत्तम दास टंडन, सम्पूर्णानन्द, राजेंद्र प्रसाद जैसे बड़े नेता और नेहरू से ज़्यादा सीनियर कांग्रेसी जो जंगे आज़ादी के लोग थे मगर उनका मुसलमानों को ले कर रुख कौन नहीं जानता और जिनको ओवररूल कर पाना, उनको रोकना, डील करना आसान नहीं था. इनमें ज़्यादातर का मुसलमानों के लिए क्या नजरिया था, ये शायद अब लोग भूल गए हैं, पढ़ा नहीं, या किसी और वजह से नहीं जानते. पंत के सामने नेहरू की यूपी तक नहीं चल पाती थी. [ये इंदिरा का अहद नहीं था जब पार्टी, सरकार, कांग्रेस वर्किंग कमिटी सब वज़ीर आज़म के हाथ में आ गयी].

गोडसे ने गांधी को मारा, इससे संघ थोड़ा बैकफुट पर हुआ मगर ये भी हर जगह नहीं हुआ था. अफसरशाही किस हद तक कम्यूनल थी. वह तो सरदार पटेल के निधन के बाद हालात बदले और नेहरू की पार्टी में चलना शुरू हुई।

पंडित नेहरू, मौलाना आज़ाद, सरदार पटेल एवम अन्य

कांग्रेस के ताक़तवर बड़े लीडर सख़्तगीर संघी ज़ेहनियत के लोग थे जो मुस्लमान को एक इंच नहीं देना चाहते थे. आज के संघ के लोगों का क्या ज़िक्र इनके सामने, ये लोग तो स्पेन को दोहराना चाह रहे थे, ४७ के ज़ोर में. जिसे हम आज संघ कहते हैं उससे बोहत हायर डिग्री के संघी उस ज़माने में कांग्रेस में मौजूद थे. ग्वालियर में क्या हो रहा था, अलवर में महाराजा ने क्या किया था, ये तो बोहत दूर थे, उससे पहले ही देहली में जो किचेन में इस्तेमाल होने वाली छुरियां मुसलमानों के घरों से ज़ब्त करवाएं थी और जब नेहरू खुद सड़क पर आये थे.

नेहरू जो थे वह थे. सत्तर या अस्सी के बाद पैदा हुई नस्ल को ये अंदाजा ही नहीं है ये नामनिहाद कांग्रेसी कैसे थे या कि कस्टोडियन का डर क्या होता था. हम लोग एक गलती करते हैं–शख्सियतों को बिलकुल रिजेक्ट करना या पैशनेट मोहब्बत, बिलकुल जज़्बाती काम. हर शख्सियत में अच्छाइयां भी होती है बुराइयां भी, सब ब्लैक एंड व्हाइट नहीं, ग्रे शेड्स भी होते हैं. मौलाना आज़ाद ने कितने इंस्टीटूशन, कितने इलाक़े बचा लिए, खामोशी से, नेहरू उनकी बात मान ही जाते थे, बोहत कुछ सुन लेते थे, कई मामलों में चीज़ें बढ़ती नहीं थीं या न्यूट्रलाइज हो जाती थीं.

उस ज़माने में कोई मीडिया नहीं था, चीफ मिनिस्टर और चीफ कमिश्नर राज (स्टेस में) की ज़्यादतियों की कोई सुनवाई नहीं थी. ये आज़ाद ही थे जो एक फोन पर सेठ गोविन्द दास जैसे ताक़तवर कांग्रेसी (संघी) का एक वार रोक कर ऐसा फैसला बदल कर, सब कुछ कर लेते थे. कांग्रेस और जंग आज़ादी में उनके सबसे विज़िबल चेहरा होने की वजह से मौलाना आज़ाद को हिन्दू राइट टारगेट नहीं कर पाया.

बातें बोहत हैं, बेरब्त हैं, क्या क्या लिखा जाए. उस ज़माने में सूबों में ब्यूरोक्रेसी का कम्यूनलिज़्म, हैरतअंगेज़ आर्डर जो मुसलमानों को टारगेट करते थे. कांग्रेस एक पॉलिटिकल पार्टी थी और उस पर जिनका तसल्लुत था, सब जानते हैं, इसके बावजूद उस पार्टी में तमाम नामुसाएद हालात के बावजूद, मौलाना ने जो किया है (एक बड़े साथी के नाते नेहरू पर उनका असर और उस के ज़रिये भी), वोह सुनहरे अलफ़ाज़ में लिखा जाने और कभी न भुलाये जाने लायक है. वैसे मौलाना हिफजुर रहमान और मौलाना हुसैन अहमद मदनी या हसरत मोहनी ने जो बन पड़ा किया, मगर आज़ाद और नेहरू की केमिस्ट्री बाद के दौर में आप कह सकते हैं रफी को जो फ्री हैंड था मगर वह यूपी के हालात में कुछ कर सकने की पोज़िशन में थे!!! (सिर्फ नेहरू के आइज़ और इयर्स के तौर पर). हमें कांग्रेस से कोई मोहब्बत कभी नहीं रही.

1962 और फिर इंदिरा के दौर में फसादात का एक सिलसिला शुरू हो गया मगर ये सच है कि जो कुछ बचा खुचा नाम निहाद सेक्युलरिज़्म या थोड़ा बोहत है, उसके लिए 1950 से 1958 और उसके बाद नेहरू के इंतक़ाल तक जो हुआ था, उसका बड़ा रोल है. नेहरू का मिज़ाज, उनकी पीएम बनने की ललक (किस में नहीं होती), उसके बावजूद, नेहरू को एक दम से रिजेक्ट करना भी ज़्यादती है. और आज़ाद का कंट्रीब्यूशन तो खैर बेहद बेहद अहम है, इसके बगैर हिंदुस्तान का ये चेहरा भी न बचा होता.

इंडिपेंडेंस के बाद हिन्दुतान में शुमाली रियासतों में हमने खुद अपनी सियासी बसीरत और तदब्बुर का इस्तेमाल नहीं किया. सियासत है, हर जगह, हर पार्टी, हर मुक़ाम पर, हर जगह चैनल ऑफ़ कम्यूनिकेशन होना चाहिए, टेक्टिकली, फिर कोई पार्टी हो… यूपी के मुस्लमान तो पाकिस्तान बनने के बाद उसकी डिमांड को लेकर खुदबखुद एक गिल्ट में मुब्तिला रहे, ऐसा गिल्ट जो कई नस्लों को चट कर गया.

बाक़ी कांग्रेस का क्रिटिसिज़्म तो हम दशकों से कर रहे हैं और करते रहेंगे, मगर जिसका जो कंट्रीब्यूशन है (निस्बतन जो बेहतर थे) उसका एतराफ़ ज़रूरी है. सब उम्मीदें और प्लानिंग थीं, स्पेन को दोहराने की. मार दिए जाएँ, डरा दिए जाएँ, नौकरियों के दरवाज़े बंद, ज़बान-कल्चर पर हमला, ज़मीनें छीनना, अजीब क़ानून जो सूबों में नाफ़िज़ हो जाते थे, जान माल पर हमले, कि नतीजे में भाग जाएँ पाकिस्तान और 10-11 से स्टेडिली घट कर मुस्लिम आबादी 5-6% या उससे भी नीचे कुछ दशकों में आ जाती. मगर कुछ ऐसे हालात हुए, सरदार पटेल के इंतक़ाल के बाद, और काफी बातें हैं। नेहरू से संघ की नफरत यूं ही नहीं है. जितना कुछ और जिस लेवल पर वह तब सैंतालीस के पुश में कर सकते थे, वोह नहीं कर पाए. आज दस बीस को मार सकते हैं, मगर उस स्केल पर जो वह चाहते थे, नहीं हो पाया

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.