स्मृति- जब रामायण केंद्रित अंताक्षरी में एक मुस्लिम युवक ने पढ़ा श्लोक

बात उन दिनों की है जब नया नया राम मंदिर आंदोलन शुरू हुआ था और हम लोग नए नए ही अपने गांव से इंटर कर आगे पढ़ाई करने इलाहाबाद गए थे। जाड़े की शीतलहरी के वक़्त एनएसएस का कैंप पड़िला महादेव गया था। उस 30-32 लड़कों में मैं अकेला मुस्लिम, एक बनिया, एक क्षत्रिय, एक कायस्थ और शेष ब्राह्मण।

मंदिरों के उस कस्बे में हमारे रुकने की व्यवस्था एक धर्मशाला में थी। रोज शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम होता। रात में सोने से पहले अंताक्षरी खेलते। बात कुछ यूँ हुयी कि अंताक्षरी में हम लोग कई दिन जीत गए। अपनी टीम से सबसे ज्यादा मैं पार्टिसिपेट करता।

मेरे पास एक प्लस पॉइंट उर्दू शेरो शायरी भी थी जो उन लोगों से अतिरिक्त हो जाती थी। एक दिन उन्होंने मुझे खासकर चुप कराने के लिए अंताक्षरी को रामायण केंद्रित कर दिया। यह जरूर था कि आप किसी भी रामायण से चौपाई, दोहा, श्लोक या या नज़्म का हिस्सा भी पढ़ सकते थे। उनको उम्मीद थी यह शर्त हमलोग स्वीकार न करेंगे। पर हमने इसको सहर्ष स्वीकार कर लिया।

उनमें एक फैज़ाबाद के पाठक जी थे जो अपने यहां रामलीला इन 7-8 साल लगातार लक्षमण का रोल किये थे और राधेश्याम रामायण में से उन्हें लक्षमण का संवाद सारा का सारा याद था। परंतु उन्हें यह नहीं पता था कि मैं भी अपने गांव की रामलीला में लव का रोल कर चुका था और मेरे बचपन का दोस्त प्रथमेश दत्त पांडे भी लक्ष्मण बनते थे और उसके रिहर्सल कराने में मुझे भी उसके ज्यादातर संवाद याद हो गए थे और उस वक़्त तक अभी स्मृति से विस्मृत नहीं हुए थे। मैंने एक रणनीति अपनाई कि सबसे पहले लक्ष्मण के संवाद ही बोलता ताकि वे संवाद फिर पाठक जी प्रयोग न कर सकें।

करीब एक घंटे तक चले अंताक्षरी में बिना हार जीत बराबरी पर ख़त्म किया गया। सोते वक़्त उनका कहना था कि यह चाल तो मुझे चुप कराने की थी जो शर्तिया राम बाण थी मगर तुमने उसे बेकार कर दिया। मैं मुस्कराया और उनसे कहा यही तो हमारी सांझी संस्कृति है जो कोई भी न तो हमें अलग कर सकता और न ही छीन सकता है। गंगा यमुना के संगम की तरह हम एक दूसरे में मिल महसूसते बहते जाते। इसी से शायद गंगा यमुनी तहज़ीब की बात होती है।

लेकिन आज लगता है यह स्मृति ही है। क्या आज जो चजोते बच्चे हैं कल इस तरह की स्मृति साझा कर पाएंगे। आज यह कहने में हिचक नहीं हाँ दुःख जरूर है कि समाज में एक अलगाव आया है। हम अपने अपने खानों में सिमटते जा रहे। कुछ दीवारें उठी हैं। इस दशहरा पर आइये समाज को बांटती इन दीवार रुपी रावण को हमेशा के लिए गिरा दें । हमारी विरासत व संस्कृति एक व सांझी है। हम एक ही चमन के भिन्न फूल हैं और यही हमारी खासियत और इस चमन की खूबसूरती है।

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