क्या कोई है, जो सुनेगा किसानों की व्यथा

हमारे देश की 80 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से  कृषि से जड़ी हुयी है.आज किसानों  की आत्महत्या करना इस देश के खास लोगों के बीच में आम सा हो गया है. कोई भी किसान की सूध लेने वाला नहीं है.  हजारों किसान अपने हाथों से लगायी हुई फसल को उजड़ते देख अपनी जान दे चुके है.

क्या  यह लोकतान्त्रिक देश के लिये शर्म की बात नहीं है. शास्त्री जी ने एक नारा दिया था ‘जय जवान जय किसान’. एक लोकतान्त्रिक देश में देश के  किसान और जवान को तो कम से कम  गर्व के साथ जीना ही चाहिए.  जवान सीमा की रखवाली करता है. किसान खेतों मे अन्न पैदा करता है. लेकिन उस अन्न की कीमत क्या होती है. यह सब को पता है.

आज अपने देश का किसान सुद-खोरों के जाल में फंसा हुआ है. करोड़ों लोगों के रोजगार के साधन कृषि को उपेक्षित नजरीये से देखा जाता है. हमारी चुनी हुयी सरकार सिर्फ फाइलों में ही कार्य कर रही है. किसानों  की हालत में कोई  बदलाव नही है.

ऊपज के दाम पिछले 20 वर्षों मे तीन-चार गुना ही बढ़े है. महंगाई लगभग 30 गुना  बढ़ गई है. उदाहरण  के तौर पर एक रूपये आलु से क्या घर की जरूरत पुरी हो सकती है. मान लो की उसके 100 क्विंटल  आलु से दस हजार रुपये मिलेंगे. एक परिवार को गुजारे के लिये दस हजार रूपये. यह तो देश में न्यूनतम गुजारे-भत्ते से भी बहुत कम है.

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ये किसान की प्रतीकात्मक तस्वीर है.

यही वास्तविक  समस्या है कि किसान को फसल का लागत मूल्य भी नहीं मिलता,  तो वह क्या करे? अंतत: वह  परेशान होकर बड़ी  बेचारगी से दुनिया छोड़ जाता है. नेताओं से भी यह बात छुपी हुयी तो नहीं है, बस वो सरकार में आकर इस समस्या से मुँह मोड़ लेते है. चुनावो के वक्त सिर्फ वोट लेना ही फर्ज नही है.

भारत के किसान की दुनिया में सबसे खराब हालत है. सबका साथ तो चुनाव में मिल गया था, लेकिन सबका विकास नही हुआ है. 60 रूपये प्रति लीटर के डीजल से  गरीब किसान को खेत में बुवाई करनी पड़ती है.  वह इतने महंगे डीजल को सर्वाइव नहीं कर सकता.

सरकार  को किसानों की खराब हालत को सुधारने के लिये ठोस नीतियां बनानी चाहिए, सरकार को तो इतनी फुर्सत थोड़ी है कि वो देश के किसानों की तरफ ध्यान दे. फसल बीमा योजना  का  फायदा भी किसानों को नही मिला है. शास्त्री जी की समय में हमारा देश आनाज आयात करता था. एक बारगी तो प्रधानमंत्री ने आनाज की कमी को लेकर स्वयं व्रत रखा था.  देश आनाज के क्षेत्र में आत्म निर्भर भी किसानों  और कृषि वैज्ञानिकों की वजह से ही हुआ है.  इनके साथ सरकार का इतना सौतेला व्यवहार तो अच्छी बात नही है.

देश का कोई  वर्ग गरीबी से कराह रहा है. हमारी सरकार उनके कुछ रूपये का कर्ज माफ करके पीठ थप थपा रही है. सामाचारों में उनके हाथो मे कर्ज माफी के सर्टिफेकट के साथ उनकी फोटो दीखायी जाती हैा.  इस तरह के कार्य से उनका विकास नही हो सकता है. किसान को  कर्ज माफ लायक नहीं बल्कि  कर्ज भरने लायक बनाना चाहिये.

स्वामीनाथन रिपोर्टलागू करनी चाहिये. देश के किसान की हालात तो हर राज्य मे खराब है. पंजाब का  किसान भी आत्महत्या कर रहा है. सरकार के द्वारा किसानों  के लिये इमानदारी पालिसी लाने की जरुरत है.  सरकारे कहती है कि  किसान की आय पर कोई  कर नही लिया जायेगा.  शर्म तो करो ढ़ाई लाख तो बहुत दूर की गोटी  है, उनकी तो सालना आय ही 25000 रूपये तक ही होती है , तो काये का इनकम टैक्स. ढ़ाई लाख  से उपर पैदा हो तो चाहे  उनसे ही कर ले लेना. कर देने लायक बनाओगे, तभी तो टैक्स लोगे.

जिस देश का किसान खुन के आसूं रोता है.एक दिल में टीस तो होती है, पर काम तो सरकार को ही करना है. सरकार को इनकी भलाई  के लिये आत्म मंथन करने की जरूरत है.  सब लोग दबाव बनाये तो हो सकता है कि आगामी बजट में  शायद  क्या पत्ता सरकार की नींद खुल जाए.

इसी आशा के साथ “जय किसान. जय हिन्द”

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