समाज के घिनौने चहरे को जगज़ाहिर करने के लिये तुम्हें “वीराँगना” बनना होगा

पिछले दिनों एक बडे शहर में एक बड़ी घटना हुई घटना बड़ी इसलिए थी क्योंकि इसमें सब कुछ बड़ा बड़ा था। एक बड़ी पार्टी का बड़ा नेता, बडे नेता का बड़ा बिगडेल बेटा,बड़ी सी गाड़ी में,बडे सरकरी अफसर की बड़ी ‘निडर’ बेटी के साथ बड़ी बदतमीज़ी करने लगा।

हम विकास बराला और वरालिका की बात कर रहे है हरियाणा बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष के बेटा की एक आईएएस अफसर की बेटी के साथ छेड़छाड़ की हरकत सिर्फ इसलिए उजागर हुई क्यूंकि वो लड़की चाहती थी की उसे उसके अपराध की सज़ा दी जाए।

इसी कारण हर अख़बार,टीवी पर ये घटना दिखाई गई। वरना रोज़ाना कितनी लड़कियों से छेडछाड़,बदसलूकी होती है सड़क पर,बस में,ट्रेन में,बाज़ार में लेकिन वो सब घटनाये एक बुरे सपने की तरह भुला दी जाती है.

इसका मुख्य कारण महिलओं में विरोध करने को अपनी बेज्ज़ती समझना है ऐसा होता भी है जानते हुए कि लड़का गलत है फिर भी एक बार महिला को शक भरी निगाहों से ज़रूर देखा जाता है.

भारत की महिलायें अभी इतनी साहसी नहीं बनी है कि एक एक कर सबको अपनी पवित्रता का जवाब दे सके।

लड़कियों का लड़कों से पिछड़ने में,ज्यादा न पढ़ पाने में,घर ,ससुराल तक सीमित रहने में ,उनकी सोच ज्यादा आगे न बढ़ पाने में, उन लडको का बहुत बड़ा योगदान है जो रोज़ाना किसी न किसी लड़की से छेडछाड़ करते है।

महिलाओं से बदसलूकी की इस वातावरण ने जाने कितनी महिलाओं के भविष्य को अँधेरे में धकेल दिया जाने कितने सपने घर की चार दीवारी में कैद हो जाते ,जाने कितने अरमान पनप ही नहीं पाते।

वो लड़कियां बड़ी सहनशील होती है जो अपने साथ हुई बदसलूकी को छुपकर अपने परिवार की लाज बचा ले जाती है अपने सारे सपने समाज की रुढिवादिता की भेंट चढ़ा कर स्वयं को घर की चार दीवारी में कैद कर लेती है वो बड़ी कठोर दिल होती है जो अपनी आवाज़ को दबा देती है वो बड़ी नरम दिल होती ही जो रोज़ाना ऐसी हरक़तो को माफ़ कर देती है.

भारत में इन लड़कियों से ज्यादा सहनशील कोई ओर नहीं होगा “ये समाज से रोज़ उसका आइना छुपाती है ये बेटियां है जो खुद की लाज गवांकर हर घर की लाज बचाती है।”

लेकिन ये समय बदलाव का है आवाज़ उठाने का है और उन लोगो की आवाज़ बंद करने का है जो समाज को रुढिवादिता की राह पर चलाये रखना चाहते है महिलओं के प्रति हिंसा इसी रुढिवादिता का एक अंग है।

दिल्ली में हुआ निर्भय कांड उस समाज के ऊपर तमाचा था जो खुद को संस्कार,एकता,सम्मान का जनक मानता था चार दिन के लिए ही सही लेकिन हमने अपने अन्दर झांका ज़रूर था।

आज भी ये देश,समाज वो वीरंगना ढूंढ रहा है जो समाज की दबी हुई आवाज़ को सुन सके जो बदलाव ला सके.बदलाव की पहली शर्त है, जागरूकता,शिक्षा, ज्ञान जितना अधिक महिलायें जागरूक होंगी जितना वो स्वयं को ,समाज को,देश को जानेंगी उतने बेहतर ढंग से समाज और देश को नए रूप में ढाल सकेंगी।

गलत का विरोध करने के लिए ज़रूरी नही की आप बड़े अफसर की बेटी हों ,न ही डरने के लिए ये ज़रूरी है कि छेड़छाड़ करने वाला बड़े नेता का बेटा है इसके लिए सिर्फ एक चीज़ चाहिए वो है “हिम्मत” स्वाभिमान की रक्षा करने की इच्छाशक्ति ।

ये इच्छा शक्ति हर लड़की में होनी चाहिए ये भावना है व्यक्ति में होनी चाहिए कि महिलाओं का सम्मान ही उनकी व हमारी संस्कृति का आधार है।

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