भले ही वो हार गयीं, पर दिल जीत लिया

पिछली दफा जब पीवी सिन्धु का रियो में ओलंपिक फाइनल देख रहे थे। आशाएं थी गोल्ड मैडल की. मैच समाप्त हुआ और उम्मीदें भी. उस समय भी सिन्धु ने हारकर भी खूब वाह-वाही लूटी। जिसकी वो सिल्वर मैडल जीतकर हकदार भी थी।

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लगभग एक साल बाद वो ही वाक्या क्रिकेट के रूप में रिपीट हुआ। इस बार बस खेल और जगह ही अलग थी।पूर्ण रूप से पुरुष-प्रधान खेल माने जाने वाले खेल  क्रिकेट में वर्ल्ड कप फाइनल को लेकर लड़कियां चर्चा में थी। सोशल मीडिया हो या सोशल मीडिया ट्रेंडिंग हर कहीं, सब जगह लोग भारत की बेटियों के लिए चीयर कर रहे थे।
पहली बार महिला क्रिकेट को लेकर इतनी दीवानगी देखी गयी। मैच के अंतिम पलों में तो ऐसा लग रहा था मानो वक़्त को लॉर्ड्स के मैदान ने रोक लिया हो। प्रत्येक बॉल पर खेल इस पाले से उस पाले में जा रहा था। अंततः अंतिम क्षणों में इंग्लैंड ने वापसी कर मैच जीत लिया था। इंग्लैंड के लिए यह खुश कर देने वाला अहसास था, उतना ही भारत के लिए निराश कर देने वाला। निराशाजनक इसलिए कि 12 साल बाद (2005) जो फाइनल तक सफ़र तय किया था उसे अंजाम तक नहीं पहुंचा सके। हम सब भारतीय टीम सोशल मीडिया पर ढांढस भरे अंदाज़ में फिर से चीयर कर रहे थे। सब सोशल-मीडिया पर बेटियों के लिए फाइनल तक पहुंचने का बधाई सन्देश लिख रहे थे। सब संदेशों में एक वाक्य कॉमन था, कि तुम मैच हारी पर दिल जीती। मैच की हार के बाद भी क्रिकेट के फैन होने के नाते कुछ बातें खुश कर देने वाली थी-
  •  पहली बार देश में महिला क्रिकेट को लेकर इस तरह का जुनून था।
  • नरेन्द्र मोदी ने भी सभी खिलाडियों की मैच से पहले हौसला अफजाई की, जो वाकई खुश कर देने वाली थी।
  • राजनीति हो या अन्य मसलों पर बंटे हुए हम कल एक होकर मैच देख रहे थे।
  • कोई भी भारतीय महिला क्रिकेटर्स को लेकर ओछी बात नहीं कर रहा था।
  • मैच एकतरफा न होकर रोमांचक था।

अंततः यही कि फाइनल हारने से दिल तो टूटा, मगर जीतकर

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