भारतीय राजनीति में परिवर्तन के चेहरे

जनलोकपाल की माँग को लेकर दिल्ली सेे शुरु हुआ एक आंदोलन अति शीघ्र ही भारत के अधिकतर भागों में फैल गया लेकिन इस देश के भाग्य-विधाता, नीति-निर्माता तनिक भी विचलित नहीं हुए । शतकों, दशकों से देश में राजनीति कर रहे धुरंधर इन टोपी पहने कुछ सिरफिरे बुजुर्ग, अधेड़ व युवा आंदोलनकारियों से तनिक भी चिन्तित नहीं थे । एक तरफ जंतर-मंतर पर एकत्रित लोग आजादी की दूसरी लड़ाई की बात कर रहे थे तो दूसरी तरफ लोकसभा, राज्यसभा व राज्यों की विधानसभाओं में बैठे घाघ खिलाड़ी मन ही मन मुस्कुरा रहे थे कि आजादी की पहली लड़ाई ही 200 वर्ष चली थी तो दूसरी तो अभी शुरु करने की बात भर चल रही है, चलो कोई बात नहीं हमारी कम से कम सात पुश्तों तक का शासन तो सुरक्षित है ।

आंदोलन समाप्त हुआ, एक नये राजनीतिक दल का उदय हुआ तो पुरातन दलों ने मिठाई बाँटी कि चलो इतिहास ने स्वयं को दोहराया और स्वतंत्रता सेनानी फिर से राजनीति व सत्ता के पुजारी बन गए, उनका स्वयं का अनुभव जो उनके साथ था । लगभग सभी प्रसन्न थे, प्राचीन युग वाले भी तथा नवयुग के सपने संजोने वाले भी । एक ही ढर्रे पर चल रहे किसी भी राजनीतिज्ञ ने ‘कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा’ से बने एक नये कुनबे को गंभीरतापूर्वक नहीं लिया । पत्रकार बंधु भी प्रसन्न थे कि पाठकों, श्रोताओं व दर्शकों को परोसने के लिए कुछ तो नया मिला । पत्रकार वार्ताओं का दौर चला, भ्रष्ट चेहरों से ईमानदारी के नकाब उतरने लगे, संचार-माध्यम इस सबका प्रसार करने लगे, व्यवस्था से पूर्णतया उदासीन हो चुके आम आदमी के दिल-ओ-दिमाग में आशा की नवकिरण का संचार होने लगा, लेकिन पुराने राजनीतिज्ञ अभी भी चिंता-मुक्त थे क्यूँकि वे धुरंधर जानते थे कि जो ऊबड़-खाबड़ राजनीतिक धरातल उन्होंने तैयार किया है उस पर खड़े रहने की कला में भी सिर्फ वो ही पारंगत हैं ।

यह वर्ष 2013 के मध्य का भारत था जब रथों पर सवार महारथियों की चाल बदलने का दृढ़ संकल्प लिए कुछ नवजात शिशु दिल्ली की सड़कों पर चलना सीखने की कोशिश में अभ्यासरत थे । सत्ताधीश आश्वस्त थे कि सत्ता उन्हीं की जागीर है, विपक्षी बस सत्ताधीशों को थोड़ा झकझोर देने की हैसियत में ही प्रसन्न थे वो भी नवजात शिशुओं का सहारा लेकर । नवजात शिशु थोड़ा संभल कर चलना भी सीख गए, बोलने भी लगे, कंकड़-पत्थर भी उठा कर फेंकने लगे लेकिन महारथी व उनके योद्धा फिर भी अविचलित रहे । धर्मनिरपेक्षता, कट्टरवाद, दक्षिनपंथ, वामपंथ, मध्यमार्ग, समाजवाद, मार्क्सवाद, धर्म, पंथ, मठ, राष्ट्रद्रोह, राष्ट्रवाद इत्यादि सब के सब अपने-अपने गढ़ में विजेता थे । राजनीति के सागर में जल पूर्णतया शांत व स्थिर था । शिशुओं के अतिरिक्त किसी को भी परिस्थितयों में परिवर्तन की आशा नहीं थी, सागर को भला कुछ शिशुओं का बालहठ कैसे अशांत व अस्थिर कर सकता था ।

फिर वर्ष 2014 का मध्याह्न आते-आते भारत की राजनीति में एक अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ जब सत्ताधीश, मुख्य विपक्षी दल तक की भूमिका में नहीं रहे । ऐसा क्या हो गया कि विपक्ष की भूमिका को ही अपना प्रारब्ध मानने वाले एकदम से सर्वप्रिय हो गये ? ऐसा क्यूँ हुआ कि देश के उदासीन नागरिक को राजनीति से पुन: जोड़ने वाले शिशुओं के सपने धराशायी हो गए ? ऐसा कैसे हो गया कि भारतीय राजनीति में 67 वर्ष तक अछूत माने जा रहे दल को ना सिर्फ जनता ने बल्कि दूसरे दलों के नेताओं ने भी आगे बढ़ कर गले से लगा लिया ? ऐसा कब हुआ कि भारतीय जनमानस सम्पूर्णतया ही बदल गया ?

क्या हुआ, क्यूँ हुआ, कैसे हुआ, कब हुआ, इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए हमें फिर वर्ष 2013 में वापिस जाना पड़ेगा । शिशुओं के बालहठ के बावजूद जब राजनीतिक सागर शांत व स्थिर था तो आखिर बेचैन कौन था जो परिवर्तन चाहता था, सत्ता परिवर्तन ? इन शिशुओं की सोच, इनकी दृढ़ता व लक्ष्य आखिर किसको असुरक्षित कर रहे थे ? आईये उस समय के घटनाक्रमों पर एक नजर डालें । शिशुओं की पत्रकार-वार्ताओं का दौर, राजनीतिज्ञों के नकाब उतर रहे थे, ऐसे में ही इन शिशुओं ने कुछ पूँजीवादियों के चेहरों से नकाब नोच डाले । बस यही था भारतीय राजनीति में परिवर्तन का क्षण । जब समूह राजनीतिज्ञ चैन की नींद सो रहे थे उसी समय पूँजीवादी अपने वातानुकूलित भवनों में बैठे आने वाली आपदा से निपटने की तैयारी में लगे थे । वे जान चुके थे कि इन नवजात शिशुओं की सोच उनके साम्राज्य के लिए घातक है । वे जान चुके थे कि ये नवजात शिशु अपना अधिकार सिर्फ माँगेंगे नहीं बल्कि आगे बढ़ कर छीन भी लेंगे । पूँजीवादियों की दूरदर्शिता ने भांप लिया था कि स्वराज की माँग करने वाले उसे प्राप्त करने में भी सक्षम हैं और पूँजीवादियों के लिए सबसे अहितकर परिस्थिति यही होती है जब जनता ही स्वयं की शासक बन जाये और स्वयं की खातिर स्वयं ही फैसले लेने लगे । पूँजीवादियों को तब और ज्यादा अपने पाँव के तले से जमीन खिसकती नजर आई जब उन्होंने देखा कि तत्कालीन सत्ताधारी भी उनका व उनके हितों का बचाव करने में अक्षम हैं । 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला हो अथवा कोयला घोटाला, आँच पूँजीवादियों के घर तक पहुँच चुकी थी, राजनीतिज्ञ अपना बचाव करने में लगे हुए थे और ये नवजात शिशु तो केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो प्रमुख तक के घर पर अपनी सतर्क निगाहें गढ़ाये बैठे थे । नवजात शिशु राजनीति की शतरंज, साजिश, कुचक्र से अनभिज्ञ थे, वे नहीं जानते थे कि पूँजीवादी-राजनीति को समाप्त करना है तो इसके लिए सत्ता में आना आवश्यक है । वास्तव में सत्ता प्राप्ति तो इन शिशुओं का ध्येय था ही नहीं, बस यहीं वे चूक गये ।

बस फिर क्या था, परस्पर द्वंद को भुला कर सब पूँजीवादी लुटेरे एक साथ आ गए और विचार-विमर्श के बाद निर्णय लिया गया कि सत्ता के शीर्ष पर बैठी पुरानी कठपुतली नाकारा हो चुकी है और यदि अपना साम्राज्य सुरक्षित रखना है तो कठपुतली को बदलना होगा । पूँजीवादियों ने अपनी नई कठपुतली ढूँढ ली और फिर पूरे देश में मेले लगाकर, कठपुतली का नाच दिखा कर, जनता में इस कठपुतली को लोकप्रिय बनाने की कोशिश की जाने लगी । ऐन इसी वक्त पर दिल्ली की सड़कों पर चलना सीख कर वो शिशु अब तरुण हो चुके थे, दिल्ली विधानसभा चुनाव में कई अनुभवी महारथी धराशायी कर दिए जुनून से लबालब इस अनुभवहीन तरुणाई ने । पूँजीवाद कराह उठा था उस दिन, अस्तित्त्व पर खतरा मंडराने लगा, जो राजनीतिक सागर शांत व स्थिर था उसमें लहरें उठने लगीं, पूँजीवादी राजनीति को अपनी बुनियाद हिलती दिखाई देने लगी थी उस दिन, सन् 2013 का वर्षांत था । पूँजीवादियों का समूह समझ चुका था कि अब उस कठपुतली के भाव भंगिमाओं से परिपूर्ण नृत्य भर से काम नहीं चलेगा, उन्होंने अपने सम्पूर्ण संसाधन उस कठपुतली के चरणों में भेंट कर उसे ईश्वर बना दिया । राजा में ईश्वर का रूप देखने की प्राचीन भारतीय परंपरा को पुनर्जीवित किया गया, संचार-माध्यमों पर आधिपत्य स्थापित करके ज्योतषियों की भविष्यवाणियों को उद्धृत कर यह स्थापित किया गया कि यह कठपुतली रूपी भविष्य का राजा ही ईश्वर का वो अवतार है जो पापियों का सर्वनाश कर भारत में धर्म की स्थापना करेगा, भारतीयों के समस्त दुखों का हरण करेगा व भारत की पूरे विश्व में पताका फहरायेगा और मेरे देश की धर्मभीरु, स्वयं को लाचार महसूस कर रही जनता इस कठपुतली उर्फ राजा उर्फ ईश्वर के चरणों में लोट-पोट हो गई और परिणामस्वरूप 2014 का ऐसा परिवर्तन देखने को मिला जिसकी कल्पना पूँजीवादियों के अतिरिक्त किसी ने नहीं की थी, तब तक किशोरावस्था प्राप्त कर चुकी तरुणाई ने भी नहीं ।

आज 2017 में मेरे उपरोक्त विचारों का आकलन आवश्यक है और आकलन करते समय निम्न प्रश्नों पर विचार अवश्य कीजिए: –
1. क्या आज 2जी स्पैक्ट्रम व कोयला घोटालों पर चर्चा होती है ?
2. क्या केंद्र सरकार की आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक नीतियाँ जनहित में हैं? यदि जनहित में नहीं तो क्या पूँजीवादियों के हित में हैं ?
3. क्या वर्तमान सरकार भी भूतपूर्व सरकार की उन्हीं नीतियों को लागू नहीं कर रही जिनका विपक्ष में रहते हुए सदैव विरोध किया था ? नीतियाँ कैसे बदल सकती हैं क्यूँकि तब भी पूँजीवादियों की कठपुतली का शासन था और आज भी ।
4. 2015 में किशोर राजनीतिक दल के हाथों इस पूँजीवादी-राजनीति को हार का सामना करना पड़ा क्यूँकि 2013-14 में इसी दल की 49 दिनों की सरकार ने दिल्ली की जनता के मन में एक विश्वास पैदा कर दिया था कि व्यवस्था-परिवर्तन संभव है ।
किशोरावस्था पार कर आज व्यस्क हो चुका नया राजनीतिक दल दिल्ली में शिक्षा व स्वास्थ्य क्षेत्र में जिस ढंग से नीतियाँ लागू कर रहा है क्या उससे पूँजीवादियों की शंका सत्य साबित नहीं होती ?

तो मेरा आकलन यही है कि जो अभूतपूर्व सत्ता परिवर्तन वर्ष 2014 में भारतीयों ने देखा वो पूँजीवादी व्यवस्था को कायम रखने के लिए पूँजीवादियों ने देश की जनता को माध्यम से करवाया था, स्वयं जनता ने नहीं किया था ।

और हाँ ये नहीं पूछेंगे कि जनलोकपाल का क्या हुआ ?
जनलोकपाल कानून युवा भारत का सपना है और युवा भारत अपने सपने स्वयं साकार करने की क्षमता रखता है । सपनों को मूर्तरूप देने में देरी का यह अर्थ कदापि नहीं हो सकता कि वो स्वप्न मृत हो चुका है ।

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