गुजरात चुनाव जीतने के लिए लिखी जा रही धार्मिक उन्माद की पटकथा

सलीम अख्तर सिद्दीकी

सड़क पर चला जा रहा था। अचानक एक तेज आवाज हुई। दो बाइकें आपस में भिड़ गर्इं थीं। दोनों बाइकों के चारों सवार सड़क पर जा गिरे। देखते ही देखते भीड़ जमा हो गई। चारों को पहचानना मुश्किल नहीं था। सभी मुसलमान थे। इलाका पूरा हिंदू बहुल था। किसी ने नहीं सोचा कि सड़क पर पड़े लोगों का धर्म क्या है? सभी उन्हें उठाने दौड़ पड़े। कोई पानी ले आया, किसी ने अपनी दुकान में बैठाया। पानी पिलाया, अस्पताल ले जाने की बात की। लेकिन उन्हें इतनी चोट नहीं आई थी कि अस्पताल ले जाने की नौबत आती।
इस तरह के नजारे हम लोग अक्सर ही देखते हैं। हिंदू सड़क पर पड़ा है, मुसलमान उसकी मदद हो आ जाते हैं। इंसानियत मरी नहीं है। यह ज्यादातर लोगों में जिंदा है।
अमरनाथ यात्रियों पर हमला हुआ। सलीम शेख नाम के ड्राइवर ने अपने हौसले से बहुत यात्रियों की जान बचाई। उसे पता था कि जिनकी जान वह बचा रहा है, वे कौन हैं? किस प्रदेश से हैं? लेकिन उसके जेहन में यही बात रही होगी कि सब इंसान हैं। जो लोग उस बस में सवार थे, उन्हें भी मालूम था कि उनका ‘नाखुदा’ सलीम शेख नाम का ड्राइवर मुसलमान है। अगर उनके दिलों में मुसलमानों के प्रति दुर्भावना होती तो वे क्यों एक मुसलमान ड्राइवर के साथ एक धार्मिक यात्रा पर निकलते? वे बस मालिक से कह सकते थे कि उन्हें मुसलिम नहीं, हिंदू ड्राइवर चाहिए। उनकी मांग पूरी हो भी जाती, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसलिए नहीं हुआ कि अमरनाथ यात्री भी इंसान थे। लेकिन संघ परिवार को यह सांप्रदायिक सद्भाव रास नहीं आता है।
हमले के बाद भाजपा जिस तरह की राजनीति पर उतर आई है, वह शर्मनाक है। सवाल यह है कि अगर कहीं कोई आतंकवादी घटना होती है, तो उसकी जवाबदेही सरकार की है या मुसलमानों की है? आखिर क्यों संघ परिवार के लोग ऐसी वारदातों के बाद मुसलमानों को कठघरे में खड़ा करते हैं? ऐसा लगता है, जैसे देश के सभी मुसलमानों नें आतंकी वारदात की हो। यह तब है, जब अभी तक यह भी पूरी तरह साफ नहीं है हमला किसने किया है? जब देश के विभिन्न हिस्सों में गाय के नाम पर लोगों को पीट पीट कर मारा जा रहा है, तो क्या इसके लिए पूरा हिंदू समाज जिम्मेदार है? नहीं है, इसके लिए वे संगठन जिम्मेदार हैं, जो गाय के नाम पर सड़कों पर अराजकता फैला रहे हैं। अगर कश्मीर में संदीप शर्मा नाम का आतंकी पकड़ा गया है, तो क्या पूरा हिंदू समाज आतंकवादी कहलाएगा? नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है।
सच तो यह है कि जिस विचारधारा की सरकार आज केंद्र और देश के कई राज्यों में है, वह एक साजिश के तहत देश में धार्मिक उन्माद फैला रही है। क्योंकि उसकी राजनीति का आधार यही है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अमरनाथ यात्रियों पर हुए हमले का राजनीतिक लाभ लेना शुरू भी कर दिया है। उन्होंने कहा है कि हमला अमरनाथ यात्रियों पर नहीं, गुजरातियों पर हुआ है। इसका मतलब समझना मुश्किल नहीं है। वे अभी से गुजरात चुनाव की पटकथा तैयार करने में जुट गए हैं। इस हमले में हुई चूक को अगर गुजरात चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है, इसमें कुछ गलत नहीं है।
अमरनाथ यात्रियों पर हुए हमले की जिम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकार की है। लेकिन हो यह रहा है कि हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की आड़ में दोनों सरकारें जवाबदेही से बच रही हैं। केंद्र सरकार और भाजपा मामले को सांप्रदायिक मोड़ देकर न केवल बचना चाहती है, बल्कि इसके बहाने सांप्रदायिक धु्रवीकरण करके राजनीतिक लाभ लेना भी चाहती है, जो उसे जरूर मिलेगा। क्योंकि कुछ लोगों ने धार्मिक उन्माद और नफरत के चलते अपना विवेक गिरवी रख दिया है।
गुजरात चुनाव धार्मिक उन्माद और नफरत के आधार पर लड़ा जाएगा, इसमें अब कोई शक नहीं रहा। केंद्र सरकार के ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ जुमले का गुब्बारा फूट चुका है। बेरोजगारी चरम पर है, निर्यात लगातार नीचे जा रहा है। देश के आर्थिक हालात नाजुक हैं। ऐसे में बस यही चारा बचता है कि देश को धार्मिक नफरत की आग में झोंक दिया जाए।

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