मुहब्बत में “मैं ” को मारना पड़ता है

मोहब्बत क्या है?

किसी को पाना या खुद को खो देना..!

इश्क़, मोहब्बत प्रेम इस दुनिया का सबसे दिलचस्प और सबसे भ्रामक विषय है.. जितने लोग उतने एहसास.. उतनी बातें..!

प्रेम दुखदायी भी हो सकता है, क्योंकि इससे आपके अस्तित्व को खतरा है.. जैसे ही आप किसी से कहते हैं, ’मुझे तुमसे मोहब्बत है.. वैसे ही आप अपनी पूरी आजादी खो देते हैं.. क्योंकि उस वक़्त कोई और आपसे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो चूका होता है..यह एक मीठा जहर है, बेहद मीठा जहर.. यह खुद को मिटा देने वाली स्थिति है..!

अगर आप खुद को नहीं मिटाते, तो आप कभी मोहब्बत का एहसास कर ही नहीं पाएंगे..! आपके अंदर का वह हिस्सा, जो अभी तक ’मैं’ था, उसे मिटना होगा, जिससे कि कोई और इंसान उसकी जगह ले सके.. अगर आप ऐसा नहीं होने देते, तो यह मोहब्बत नहीं है, बस स्वार्थ है, हिसाब-किताब है, लेन-देन है..!
किसी से लगाव होना, किसी की आदत होना या किसी की ज़रूरत होना मोहब्बत नहीं है.. अपनी सैटिस्फैक्शन के लिये किसी पर डिपेंड होना इश्क़ नहीं है.. ज्यादातर लोग attachment को प्यार समझ लेते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है..
लगाव एक प्रकार से निर्भरता का पर्यायवाची है..जब आप अपने लिये, अपनी उम्मीदों को पूरा करने के लिये, अपनी खुशी के लिये किसी पर निर्भर हो जाते हैं। इस वजह से उसके साथ लगाव महसूस करते हैं, लेकिन ज़रा सी भी आपकी उम्मीदें डगमगाती हैं, आपने जो चाहा जो सोचा वो पूरा नहीं होता तो उस शख्स से चिढ़ने लगते हैं, फिर धीरे धीरे आप frustrate होने लगते हैं।
dependency आपके अंदर डर को जन्म देती है.. आप सोचते हैं ये रिश्ता नहीं रहा तो क्या होगा, मैं कैसे रहूँगा या रहूंगी?
तो क्या ये डर प्यार है?

आपको किसी व्यक्ति की शक्ल, स्वभाव, बात चीत करने का तरीका कुछ भी नहीं पसन्द, लेकिन फिर भी आप उसको छोड़ नहीं पा रहे, आप उसमें हज़ार कमियां निकालते हैं लेकिन नशे की लत की तरह न चाह कर भी उसे ढो रहे हो तो क्या ये addiction प्यार है?

किसी का पार्टनर रोज उसे humiliate करता है, misbehave करता है, लेकिन फिर भी वो उसके साथ है, क्योंकि वो उसकी ज़िन्दगी की बेसिक ज़रूरतें पूरी कर रहा है, उसके अंदर डर है कि उसके बिना उसकी ज़िन्दगी कैसे चलेगी, ज़रूरतें कैसे पूरी होंगी?
तो क्या ज़रूरतें प्यार है?

इनमें से कुछ भी प्यार नहीं है.. कुछ भी ऐसा जो हम सिर्फ अपनी ख़ुशी, अपनी satisfaction अपनी जरूरत पूरी करने के लिये करते हैं, वो प्यार नहीं.. जहां सामने वाले की एक गलती पर आप तिलमिला उठें, आपके ईगो पर भयंकर ठेस पहुँच जाए, वहां प्यार नहीं हो सकता!

जब आप वाकई किसी से मोहब्बत करते हैं तो आप अपना व्यक्तित्व, अपनी पसंद-नापसंद, अपना सब कुछ समर्पित करने के लिए तैयार होते हैं..! जब प्रेम से ऊपर खुद का अहम् होता है, तो लोग कठोर हो जाते हैं..! मोहब्बत सेल्फ रेस्पेक्ट और ईगो से कहीं ऊपर की चीज़ है!

प्रेम आपसे आपकी पसन्द नापसन्द जिद नाराजगी इन सबसे ऊपर उठकर संपूर्ण समर्पण मांगता है..!!

जो प्यार आपके अंदर डर, बैचेनी और कोलाहल भर दे वो प्यार नहीं है..!
दुनियाभर की बैचेनी जिसके करीब होने से सुकून में तब्दील हो जाये वो प्यार है..!
जहां खोने का डर न हो वो प्यार है..!
जहां अपनी गलतियों पर भी बेफिक्री हो वो प्यार है..!!?

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