फर्जी फेमिनिस्ट्स, सो कॉल्ड एथिस्ट या प्रोग्रेसिव लोगों से क्यों चिढ़ है मुझे – युवा पत्रकार मुहम्मद अनस

अपनी बेबाक़ टिप्पणी और जानदार लेखनी के लिये मशहूर युवा पत्रकार मोहम्मद अनस एक फिर अपनी बेबाक़ टिप्पणी के लिये चर्चा में हैं. ज्ञात हो मोहम्मद अनस सोशल मीडिया में क्रिस गेल की तरह बल्लेबाज़ी करते हैं, ऊनकी हर टिप्पणि वैसा ही करारा प्रहार होती है, जैसा क्रिस गेल गेंद को अपने क़रारे प्रहार से बाऊंड्री के बाहर पहुंचाते हैं.

पत्रकार मोहम्मद अनस के फेसबुक अकाउंट से ली गई तसवीर

आईये देखते हैं, क्या लिखा है मोहम्मद अनस ने :-

खुर्शीद अनवर याद हैं? दक्षिण एशिया खासकर भारत, नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान में महिलाओं को सम्मानपूर्वक हालत में जीने लायक माहौल तैयार कर रहे थे वे, धर्मांध लोगों से लड़ना सिखा रहे थे।

किन लोगों ने मारा उन्हें ? उन्होंने ही जो हर रात उनके घर पर शराब पीते थे। अपनी महिला मित्रों के साथ जाया करते थे। जो उनके कार्य की तारीफ करते थे। उनकी एक आवाज़ पर जमा हो जाते थे।
क्यों मारा? इसी फेसबुक के चक्कर में। फेसबुक पर नारीवादी बनने की होड़ में उस शख्स की जान ले ली गई। आरोप था रेप का। कोई सबूत नहीं। सिर्फ कैरेक्टर असिसेनेशन। एक ने लिखा। दूसरे ने लिखा फिर सब लिखने लगे। वह रोता रहा। सबसे मिल कर बताता रहा। कोई सुनने को तैयार नहीं। फेमिनिज्म का सवाल था। औरत थी सामने इसलिए उसकी हर एक बात झूठी। दिल्ली में बैठे मोटी तोंद से लेकर चिपके मुंह तक वाले वामपंथियों ने उसकी एक न सुनी। आखिर में टीवी पर उसकी इज्जत उछाली गई। पुलिस तक मामला गया। फिर वो मर गया। बाद उसके मरने के सभा और सेमीनार हुए। गीत गाए गए। पर उन गीतों में एक डर था, कि कहीं औरतें नाराज़ तो नहीं हो जाएंगी, सब नपे तुले शब्दों में भाषण दे रहे थे। किसी ने नहीं कहा कि बलात्कार का आरोप झूठा भी होता है।

जान लेने के बाद सबने फेसबुक अकाउंट बंद कर दिया महीनों के लिए, अकाउंट बंद कर देने से खुर्शीद की वापसी नहीं हो सकी। वे सब फिर से वापस आ गए। मैं सबको जानता हूं, सब मुझे जानते हैं। हिंदी में लिखने वाला/वाली हर एक प्रगतिशील और नारीवादी को व्यक्तिगत जानता हूं। उनकी सोच और रहन सहन से वाकिफ हूं। आज जब उन सबको देखता हूं तो हंसी छूट जाती है। वे फिर से लिखने लगे हैं। उनका लिखा वापस से मुख्यधारा में स्थान हासिल करने लगा है।

औरत ने लिख दिया मतलब अंतिम सत्य हो गया? सेक्स एक नितांत निजी क्रिया है। दो लोगों के मध्य यह तभी संभव होती है जब दोनों की सहमति हो। फेसबुक चैट में सेक्स करने की मांग कोई करे तो उसे ब्लॉक कर दें। आपकी मर्ज़ी नहीं है सेक्स करने की तो कोई चैट में से निकल कर थोड़ी न कर लेगा। हो सकता है बातचीत इतनी आगे बढ़ गई हो कि बात सेक्स पर आ गई। दलित एक्टिविस्ट ओम सुधा ने महिलाओं के इनबॉक्स में घुसने की हिम्मत तभी दिखाई होगी जब महिलाओं ने उसे कुछ थमाया होगा। कोई मूर्ख नहीं है कि बस मुंह उठाया और चला गया सेक्स की बात करने को। दुपट्टा तो नहीं खींचा था उसने। स्कर्ट तो नहीं उतारी उसने। अनुमति ही तो ले रहा था। रिजेक्ट का ऑप्शन आपके पास है। आप कितनी दूध की धुली हैं पता है मुझे।

एक तरफ तो आप कहती हैं कि सेक्स पर खुल कर बात होनी चाहिए। सेक्स टैबू है। टैबू तोड़ने होंगे। दूसरी तरफ कोई सेक्स पर बतियाने लगा तो उसको सरेआम बेईज्जत करें। यह कौन यी पॉलिटिक्स है पॉर्टनर। दस नहीं वह सौ औरतों से चैट कर रहा हो, आपका क्या बिगाड़ा? आपको ब्लैकमेल किया? कहा क्या उसने कि सेक्स नहीं करोगी तो घर पर चढ़ जाएंगे? कहा क्या उसने कि सेक्स करो वरना स्क्रीनशॉट लगा देंगे? इतना मौका ही क्यों दिया किसी ओम सुधा को कि बात सेक्स तक चली आई। अपना गिरेबां झांकिए हुजूर। सेक्स मतलब चवन्नी। कुछ नहीं होता यह। यही तो सिखाता है न फेसबुकिया सो कॉल्ड प्रोग्रेसिव तबका। फिर सेक्स को लेकर इतना हाइप ?

स्क्रीनशॉट आयोग का गठन हो रहा है। आवेदन के लिए हवेली पर आएं। वे लोग हवेली पर न आएं जो पहले आ चुके हैं। हवेली है हमारी, धर्मशाला नहीं। और हां, थोड़ा पढ़िए लीखिए, ‘कच्छा’ बारह के बाद कला वर्ग से स्नातक करके कढ़ी चावल बनाने वाली औरतें फेमिनिज्म पर बात करने से पहले हरी मटर की पूड़ी बनाना सीख लें। पति खुश रहेंगे।

इसके आगे मोहम्मद अनस ने कहा-

मुझे ओम सुधा से कोई सहानुभूति नहीं है, लेकिन वे औरतें और मर्द जो उस पर आरोप लगा रहे हैं वे सब कैसे हैं, हम जानते हैं। एक ही थाली के चट्टे बट्टे सब।

देखे मोहम्मद अनस की फेसबुक वाल पर यह पोस्ट

 

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