नफ़रत की उपजाऊ ज़मीन है, सोशल मीडिया पर ब्रेनवाश का सिस्टम

हमारे भारत में बहुत लोग बसते हैं। हमारी तादाद भारी है। उसमें नयी उम्र के लोग कहिये तो काफी से भी ज्यादा हैं। हमारे इस प्यारे से देश में आज भी गाँव और छोटे शहर ही ज्यादा हैं। और ऐसे हर शहर और हर छोटे-बड़े गाँव में पल रहे युवाओं में फैशन का शौक टीवी के रंगीन पर्दों ने कुछ ऐसा डाला कि अब वे पिछले दशक से मची सूचना-क्रांति के अंधड़ में टीवी के रंगीन परदे को हाथ में ही धर लेना चाहने लगे।

तकनीकी प्रगति ने ऐसा होने भी दिया। हमारे मोबाइल धीरे-धीरे बड़े होने लगे और आज तकरीबन हर युवा अपने हाथ में एक स्मार्ट फोन पाता है। नकली फ़ैशन में डूबा हुआ वह युवा खुद को पढ़ा-लिखा भी समझता है क्योंकि उसके पास स्मार्टफोन है और कॉलेज की डिग्रियाँ हैं। हम बखूबी समझते हैं कि कॉलेज की डिग्रियाँ हमें कैसे मिलतीं हैं और उस हिसाब से हमारे भीतर ज्ञान का प्रकाश कितना उपलब्ध होता है। बहुत लोग इसलिए भी खुद को ज्ञानी समझने का भ्रम पाले हुए घूमते हैं क्योंकि उन्हें कोई नौकरी मिल गयी है।

बड़े शहरों की भी बात अगर हम इस सिलसिले में कर लें तो मेरे जैसे गाँव-देहात के आदमी (rustic fellow) को कुछ यों लगता है जैसे शहर-शहरात के ज्यादातर युवा भी पिज़्ज़ा-बर्गर संस्कृति में पले हुए और अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े हुए कोई टैगोर या आइन्सटीन जैसी प्रतिभा नहीं पा लेते, वे भी थोड़े सॉफिस्टिकेटेड अध-पढ़े ही होते हैं। वास्तविक रूप से किताबों के प्रेमी और ज्ञान-पिपासु (knowledge-thirsty) युवा की संख्या सदा की भाँति आज भी कम ही है। कुल मिलाकर आज हमें किताबों का ज्ञान बहुत थोड़ा सा है और जिसे हम अपने भीतर ज्ञान जैसा कुछ कह पाते हों, वह है फ़ेसबुकिया ज्ञान और व्हाट्सएप्प-ट्विटर ज्ञान।

इन सभी मंचों पर सूचना प्रसारित करने वाली दो लॉबी है। दक्षिणपंथियों (आरएसएस, बीजेपी, विहिप, शिव-सेना, बजरंग दल इत्यादि) की लॉबी और अन्य विचारधाराओं वाली लॉबी। यहाँ याद रहे, सूचना प्रौद्योगिकी (information technology) की इस घमासान दौड़ में राजनीति भी अब जनता का फैशन बन चुकी है। आज ज्ञान का आधार भी यही है… ज्ञान प्राप्ति का आधार भी और ज्ञान के प्रदर्शन का आधार भी। तो ऐसे में हमारी युवा पीढ़ी का 65-70 प्रतिशत जो व्हाट्सएप्प-फेसबुक और ट्विटर आदि के माध्यम से ही ज्ञानवर्धन करने को अभिशप्त (doomed) है, दक्षिणपंथी विचारों के सम्पूर्ण प्रभाव में आकर अपने मस्तिष्क में पवित्र गोबर और गौमूत्र का घोल डालकर धन्य हो रहा है। उनकी लॉबी ज्यादा कारगर है, सिद्धहस्त (skilled) भी वे ही हैं और दुर्भाग्य से संख्याबल में भी वे ही अधिक हैं क्योंकि उनके अनुगामी (followers as recipients of their gobbledegook) यानि उनका ऑडियंस बड़ा है।

सोशल मीडिया पर वे तरह-तरह की ऊलजुलूल कहानियाँ गढ़ते हैं, मोहक रूप से भ्रमपूर्ण और समाज तथा देश-विरोधी किस्से प्रसारित करते हैं। युवाओं के ग्रहणशील (susceptible) मन पर वे बड़ी आसानी से प्रभावी हो जाते हैं। सोशल मीडिया पर फैलाये उनके कचरे का इस तरह युवा पीढ़ी के दिल-दिमाग पर हावी होना हमारे घुप्प अँधेरे भविष्य की ओर भयावह इशारा करता है।

हम एक बहुत बड़े सांस्कृतिक संकट (cultural crisis) से गुजर रहे हैं और ऐसे में हमें जहाँ तक हो सके, एक पुनर्जागरण का शंखनाद (clarion call of renaissance) करना होगा। एक वैचारिक क्रांति लानी होगी। सोशल मीडिया पर किसी तरह के भी ऑडियो, वीडियो या टेक्स्ट के रूप में उनके द्वारा फैलाये गए भगवा सन्देशों (saffronized contents in the form of audio, video or text) के विरुद्ध एक ऐसी विचारशील आँधी उठानी होगी जिससे हमारे करोड़ों युवाओं का मस्तिष्क गोबर न हो सके। उनका ब्रेनवाश रुक सके। अगर हम सोशल मीडिया पर इतना भी कर सकें तो बहुत होगा।

प्रणाम।

: – मणिभूषण सिंह

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