“इस्लाम की शिक्षा और आज का मुस्लिम समाज” (भाग-1)

(“इस्लाम की शिक्षा और आज का मुस्लिम समाज” लेख का पहला हिस्सा प्रस्तुत है कृपया पूरा पढें! और अपने सुविचार कमेंट बॉक्स मे प्रस्तुत करें)

“इस्लाम की शिक्षा” और “आज का मुस्लिम समाज”, ये दो अलग-अलग शब्द और अलग विषय हैं। मगर इन्हे जब जोड दिया जाये तो एक ऐसा सच सामने आता है, जिसके बारे मे शायद ही गौर किया गया हो, या कभी गौर किया भी गया हो,तो बस यूं ही।इस्लाम की शिक्षा आज भी वही हैं, जो उस वक़्त थी। फ़र्क़ है आज के मुस्लिम समाज के द्वारा किये जाने वाले उन कार्यों पर, जिनकी वजह से लोग इस्लाम पर उंगली उठाते हैं । एक ऐसा फर्क़ जो इस क़ौम के सुरैया से ज़मीन पर आने की वजह बना । किसी भी चीज़ का मूल (जड) से हट जाना उसके अस्ल को खत्म कर देता है, और कुछ ऐसा ही महसूस होता है आज के मुस्लिम समाज को देखकर ।

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“इस्लाम अक़ीदा (आस्था, विश्वास) और शरीअत (नियम, क़ानून, शास्त्र) का नाम है। जिस में अल्लाह और उसके अंतिम रसूल मुहम्मद सल्ल. ने हलाल और हराम (वैध और अवैद्ध), नैतिकता, शिष्टाचार, उपासना के कार्य, मामलात, अधिकारों और कर्तव्यों और क़यामत के दृश्यों को स्पष्ट किया है। “
इस्लाम मे ईमान और अमल (विश्वास व कर्म) की बहुत अधिक वैल्यू है। ईमान उन चीज़ों पर लाना जिनके बारे मे क़ुरान ने हमे बताया, और क़ुरान ने जो भी चीज़ हमे बताई जो हम नही जानते, उसके लिये दलील (प्रमाण) और निशानियां प्रस्तुत की । इसी तरह अमल या कर्म के बारे मे हमे बता दिया गया । एक जीवनशैली बताई गयी, एक पूरा ढांचा हमे बताया गया। जब तक उस ढांचे पे ढले रहे, ऊंचाईयों को छूते रहे! जैसे ही उस ढांचे से बाहर आये क्या हुआ……नतीजा सामने है
जो क़ौम शिक्षा का समुंदर थी,आज उस क़ौम मे बहुत बडी तादाद को शिक्षा की बूंद भी नसीब नही है। इन्हे तो ये भी नही पता कि दुनिया जिस रसायन विज्ञान की तरक़्क़ी की वजह से इतराती है, उसका जनक अबु मूसा जाबिर इब्ने हय्यान जिसे दुनिया “गीबर” के नाम से जानती है, जिसे फादर-ऑफ-केमिस्ट्री कहा जाता है वोह इन्ही मे से एक था। ये वोह दौर था जब लोग इस क़ौम के इल्म-व-फन का लोहा मानते थे।
आज का मुस्लिम समाज मे अधिकतर लोग एक तरह से नाम के मुस्लिम हैं। न जाने कितने ऐसे गलत कार्य हैं, जिनके करने की वजह से (चूंकि वोह मुस्लिम है इसलिये ) लोग तो यही समझते हैं, कि यही इस्लामिक शिक्षा है। ना जाने ऐसे कितने ही लोग हैं जो आज भी बेटियों की पैदाईश पर गम मनाते हैं, जबकि पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. की तो चार-चार बेटियां थीं । और फिर बेटी हो या बेटा, ये तो अल्लाह की मर्ज़ी पे निर्भर करता है।
ऐसी ढेर सी बाते हैं, जिन पर चर्चा जारी रहेगी । इस लेख के अगले भाग मे हम आज के मुस्लिम समाज पर बहुत सी बातें करेंगे
। बने रहिये हमारे साथ।
(जारी है>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>जारी है)

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