सावधान! दुष्प्रचार के इस दौर मे आपकी एक गलती इस्लाम को बदनाम करने के लिये काफी है।

ताईफ मे पत्थरों की बरसात हो या नमाज़ पढते हुये मस्जिद-अल-हराम मे आप सल्लललाहु अलैहि वसल्लम की पीठ के ऊपर डाली गयी ऊंट की ओझढी हो । फिर शैबे अबि-तालिब की पहाडियों मे बिताये वोह दिन,कि खाना न होने पर बच्चों के भूख से बिलखने पर उन्हे सूखा चमडा पानी मे भिगोकर भूख मिटाना पडता था। या फिर सिर्फएक-सिर्फएक का नारा देते हुये अरब की रेगिस्तान मे तपती हुयी रेत पे लिटाये गये बिलाल की पीठ पे पडते हुये कोडे हों। या फिर हब्शा की तरफ पैदल हिजरत हो, मक्का पे ज़ुल्म-व-सितम का वोह सिलसिला जिसके तहत सुमय्यह रज़ि. के दो ऊंटों पे बांधकर उन्हे अलग-अलग दिशा मे चलवाकर उन्हे बेरहमी से शहीद किया गया हो।                                  और भी न जाने कितने ज़ुल्म-व-सितम जो इस क़ौम के साथ हुये, मगर ये क़ौम सब सहते चली गयी और क़ामयाबी कि वोह इबारत लिखी कि दुनिया देखती रह गयी । उसकी वजह थी,सिर्फ एक ! ये वोह लोग थे कि जिन्होने कभी अपनी तौहीद से समझौता नही किया । उन्होने इस्लाम को वैसा ही माना जैसा वही मे हुक्म होता और रसूल-ए-अकरम सल्ल. ने उस हुक्म पे अमल करके बताया । आज आपको दुनिया मे मुस्लिमों की तादाद तो बहुत मिल जायेगी, जिनके नाम तो मुस्लिमों के जैसे हैं, मगर क्या वोह जिन कामों को अंजाम देते हैं, उन कामों का इस्लाम से कोई नाता है? क्या जिन कामों को इस्लाम का नाम देकर किया जाता है, हुक्मे इलाही और फरमाने रसूल के  मुताबिक हैं? क्या सहाबा और उनके शगिर्दों ने इस्लाम को ऐसे ही समझा था ?क्या ये कहना सहीह नही होगा कि मिलावट के इस दौर मे कोई भी चीज़ जिसे आप इस्लाम कह रहे हैं, उसे किताब व सुन्नत के तराज़ू मे रखकर सहाबा की समझ वाले पैरामीटर से जांचना होगा ?

सावधान! दुष्प्रचार के इस दौर मे आपकी एक गलती इस्लाम को बदनाम करने के लिये काफी है।

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